भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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[ ३ ]

देव उत्पन्न हो गये। जब वे इन्द्रियाधिष्ठाता देवता इस महासमुद्रमें आये तो परमात्माने उन्हें भूख-प्याससे युक्त कर दिया। तब उन्होंने प्रार्थना की कि हमें कोई ऐसा आयतन प्रदान किया जाय जिसमें स्थित होकर हम अन्न-भक्षण कर सकें। परमात्माने उनके लिये एक गौका शरीर प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने 'यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है' ऐसा कहकर उसे अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् घोड़ेका शरीर लाया गया किन्तु वह भी अस्वीकृत हुआ। अन्तमें परमात्मा उनके लिये मनुष्यका शरोर लाया। उसे देखकर सभी देवताओंने एकस्वरसे उसका अनु- मोदन किया और वे सब परमात्माकी आज्ञासे उसके भिन्न-भिन्न अवयवों- में वाक्, प्राण, चक्षु आदि रूपसे स्थित हो गये। फिर उनके लिये अन्नकी रचना की गयी। अन्न उन्हें देखकर भगने लगा। देवताओंने उसे वाणी, प्राण, चक्षु एवं श्रोत्रादि भिन्न-भिन्न करणोंसे ग्रहण करना चाहा; परन्तु वे इसमें सफल न हुए। अन्तमें उन्होंने उसे अपानद्वारा ग्रहण कर लिया। इस प्रकार यह सारी सृष्टि हो जानेपर परमात्माने विचार किया कि अब मुझे भी इसमें प्रवेश करना चाहिये, क्योंकि मेरे बिना यह सारा प्रपञ्च अकिञ्चित्कर ही है। अतः वह उस पुरुषकी मूर्द्धसीमाको विदीर्णकर उसके द्वारा उसमें प्रवेश कर गया। इस प्रकार जीवभावको प्राप्त होनेपर उसका भूतोंके साथ तादात्म्य हो जाता है। पीछे जब गुरुकृपासे बोध होनेपर उसे अपने सर्वव्यापक शुद्ध स्वरूपका साक्षात्कार होता है तो उसे 'इदम्'—इस तरह अपरोक्षरूप- से देखनेके कारण उसकी 'इन्द्र' संज्ञा हो जाती है। इस प्रकार ईक्षणसे लेकर परमात्माके प्रवेशपर्यन्त जो सृष्टिक्रम बतलाया गया है, इसे ही विद्यारण्यस्वामीने ईश्वरसृष्टि कहा है। 'ईक्षणादिप्रवेशान्तः संसार ईशकल्पितः'। इस आख्यायिकामें बहुत-सी विचित्र बातें देखी जाती हैं। यों तो मायामें कोई भी बात कुतूहलजनक नहीं हुआ करती; तथापि आचार्यका तो कथन है कि यह केवल अर्थवाद है। इसका अभिप्राय आत्मबोध करानेमें है। यह केवल आत्माके अद्वितीयत्व-