ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें५० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १ मिदं संहतानां वागादीनामभि- | होते हैं उसी प्रकार जिसके लिये व्याहतादि, यथा स्तम्भकुड्या- | इन संघातस्वरूप वाणी आदिके दीनां प्रासादादिसंहतानां स्वाव- | उच्चारणादि व्यापार हैं और जो इन यवैरसंहतपरार्थत्वं तद्वदिति । | वाणी आदिके उच्चारणादिको 'इदम्' इस प्रकार जानता है वह मैं सत् और चेतनस्वरूप हूँ। एवमीक्षित्वातः कतरेण | इस प्रकार विचारकर [ उसने प्रपद्या इति । प्रपदं च मूर्धा चास्य | सोचा ] अतः मैं किस द्वारसे प्रवेश संघातस्य प्रवेशमार्गौ । अनयोः | करूँ ? इस संघातमें प्रवेश करनेके कतरेण मार्गेणेदं कार्यकारण- | दो मार्ग हैं-पदाग्र और मूर्धा । संघातलक्षणं पुरं प्रपद्यै प्रपद्ये- | इनमेंसे मैं किस मार्गसे इस कार्य- येति ॥११॥ | करणके संघातस्वरूप पुरमें प्रवेश करूँ ? ॥ ११ ॥ परमात्मका मूर्द्धद्वारसे शरीरप्रवेश एवमीक्षित्वा न तावन्मद्- | इस प्रकार विचारकर परमेश्वरने भृत्यस्य प्राणस्य मम सर्वार्थाधि- | निश्चय किया-'मैं सम्पूर्ण कार्योंके कृतस्य प्रवेशमार्गेण प्रपदाभ्या- | अधिकारी अपने सेवक प्राणके प्रवेश- मधः प्रपद्ये । किं तर्हि पारि- | मार्ग निम्नदेशीय चरणाग्रोंसे तो शेष्यादस्य मूर्धानं विदार्य प्रपद्ये- | प्रवेश करूँगा नहीं। तो फिर यमिति लोक इवेक्षितकारी- | किससे करूँगा ? अतः पदाग्रको त्यागकर बचे हुए मूर्धाको ही विदीर्ण करके प्रवेश करूँगा। इस प्रकार सोच-समझकर काम करनेवाले लोगों- के समान- स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्दतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथा-