ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ
पृष्ठ 61, कुल 108 में से
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ स्त्रयः स्वप्नाः; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ वह इस सीमा ( मूर्द्धा ) को ही विदीर्णकर इसीके द्वारा प्रवेश कर गया । वह यह द्वार 'विदृत्ति' नामवाला है; यह नान्दन ( आनन्द- प्रद ) है । यह आवसथ [ नेत्र ], यह आवसथ [ कण्ठ ], यह आवसथ [ हृदय ] इस प्रकार इसके तीन आवसथ ( वासस्थान ) और तीन स्वप्न हैं ॥ १२ ॥
| [संस्कृत-भाष्यम्] | [हिन्दी-भाष्यार्थ] |
|---|---|
| स स्रष्टेश्वर एतमेव मूर्द्धसी- | वह सृष्टिकर्ता ईश्वर इस मूर्ध- |
| मानं केशविभागावसानं विदार्य- | सीमाको ही, जिसका केशोंका विभाग |
| च्छिद्रं कृत्वैतया द्वारा मार्गेणेमं | ही अवसान है, विदीर्ण कर अर्थात् |
| लोकं कार्यकारणसंघातं प्रापद्यत | उसमें छिद्र कर · उसीके द्वारा-उस |
| प्रविवेश । सेयं हि प्रसिद्धा द्वाः | मार्गसे ही इस लोक अर्थात् भूत |
| मूर्ध्नि तैलादिधारणकाले अन्त- | और इन्द्रियोंके संघातमें प्रवेश कर |
| स्तद्रसादिसंवेदनात् । सैषा | गया । वही प्रसिद्ध द्वार है, क्योंकि |
| विदृत्तिर्विदारितत्वाद्विदॄत्तिर्नाम | शिरमें तैल आदि धारण करते समय |
| प्रसिद्धा द्वाः । | भीतर उसके रसादिका अनुभव होता |
| है । विदीर्ण किया जानेके कारण | |
| वह द्वार 'विदृत्ति' अर्थात् विदृति नाम- | |
| से प्रसिद्ध है । | |
| इतराणि तु श्रोत्रादिद्वाराणि | इससे भिन्न जो श्रोत्रादि द्वार हैं |
| भृत्यादिस्थानीयसाधारणमार्ग- | वे भृत्यादिरूप साधारण मार्ग होनेके |
| त्वान्न समृद्धीनि नानन्दहेतूनि । | कारण समृद्ध अर्थात् आनन्दके हेतु |
| इदं तु द्वारं परमेश्वरस्यैव केवल- | नहीं हैं । किन्तु यह मार्ग तो केवल |
| स्येति तदेतन्नान्दनं नन्दनमेव । | परमेश्वरका ही है । अतः यह |
| नान्दन ( आनन्दप्रद ) है । नन्दनको | |
| ही यहाँ नान्दन कहा है । |