ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत] नान्दनमिति दैर्घ्यं छान्दसम् । नन्दत्यनेन द्वारेण गत्वा पर- स्मिन्ब्रह्मणीति । तस्यैवं सृष्ट्वा प्रविष्टस्य जीवे- नात्मना राज्ञ इव पुरं त्रय आवसथाः । जागरितकाल इन्द्रियस्थानं दक्षिणं चक्षुः, स्वप्न- कालेऽन्तर्मनः, सुषुप्तिकाले हृदयाकाश इत्येतत् । वक्ष्यमाणा वा त्रय आवसथाः; पितृशरीरं मातृगर्भाशयः स्वं च शरीरमिति । त्रयः स्वप्ना जाग्रत्स्वप्नसुषु- प्स्याख्याः । ननु जागरितं प्रबोधरूपत्वान्न स्वप्नः; नैवम्, स्वप्न एव । कथम् ? परमार्थ- स्वात्मप्रबोधाभावात्स्वप्नवदसद्व- स्तुदर्शनाच्च । अयमेवावसथश्चक्षु- र्दक्षिणं प्रथमः, मनोऽन्तरं द्वितीयः, हृदयाकाशस्तृतीयः ।
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] 'नान्दनम्' इस पद [के नकार] में दीर्घ वैदिक प्रक्रियाके अनुसार है। तात्पर्य यह है कि इस मार्गसे जाकर पुरुष परब्रह्ममें आनन्द प्राप्त करने लगता है। पुरमें प्रविष्ट हुए राजाके समान इस प्रकार रचना करके उसमें जीवरूपसे प्रवेश करनेवाले उस ईश्वरके तीन आवसथ हैं—(१) जाग्रत्कालमें इन्द्रियोंका स्थान दक्षिण नेत्र, (२) स्वप्नकालमें मनके भीतर और (३) सुषुप्तिमें हृदयाकाशके अन्दर । अथवा आगे बतलाये जानेवाले पितृदेह, मातृ- गर्भाशय और अपना ही शरीर—ये ही तीन आवसथ हैं। तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन स्वप्न हैं। यदि कहो कि प्रबोधरूप होनेके कारण जाग्रत् स्वप्न नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है; वह भी स्वप्न ही है। किस प्रकार ? क्योंकि उस समय परमार्थ आत्मस्वरूपके बोधका अभाव होता है और स्वप्नके समान असत् वस्तुएँ दिखलायी दिया करती हैं। [उन आवसथोंमें] यह दक्षिण नेत्र ही प्रथम है, मनका अन्तर्भाग द्वितीय है और हृदयाकाश तृतीय है।