भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ स्मृतिषु च गीताद्यासु “समं | तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्” | स्थित परमेश्वरको” इत्यादि वाक्यों- ( गीता १३।२७) इत्यादिना । | द्वारा गीता आदि स्मृतियोंमें भी | [ यही बात कही गयी है । ] ननु त्रय आत्मानः । भोक्ता | पूर्व०—आत्मा तो तीन हैं; [आत्मैकत्त्वे विचारः] कर्ता संसारी जीव | उनमें एक तो सम्पूर्ण लोक और एकः सर्वलोक- | शास्त्रमें प्रसिद्ध कर्ता भोक्ता संसारी- शास्त्रप्रसिद्धः । अनेकप्राणिकर्म- | जीव है । नगर और प्रासादादिके फलोपभोगयोग्यानेकाधिष्ठानव- | निर्माणके लिङ्गसे जिस प्रकार ल्लोकदेहनिर्माणेण लिङ्गेन यथा- | तत्सम्बन्धी कौशलके ज्ञानवाले उनके शास्त्रप्रदर्शितेन पुरप्रासादादि- | रचयिता तक्षा (कारीगर) आदिका निर्माणलिङ्गेन तद्विषयकौशलज्ञान- | ज्ञान होता है उसी प्रकार अनेक वांस्तत्कर्ता तक्षादिरिवेश्वरः सर्वज्ञो | प्राणियोंके कर्मफलके उपभोगयोग्य जगतः कर्त्ता द्वितीयश्चेतन आ- | अनेकों अधिष्ठानोंवाले लोक और त्मा अवगम्यते । “यतो वाचो | देहकी रचनाके शास्त्रप्रदर्शित निवर्तन्ते” ( तै० उ० २।४। | लिङ्गसे दूसरे चेतन आत्मा—जगत्- १) “नेति नेति” ( बृ० उ० | कर्ता सर्वज्ञ ईश्वरका ज्ञान होता है । ३।९।२६) इत्यादिशास्त्र- | तथा तीसरा आत्मा “जहाँसे वाणी प्रसिद्ध औपनिषदः पुरुषस्तृ- | लौट आती है” एवं “यह नहीं, तीयः । एवमेते त्रय आत्मानोऽ- | यह नहीं” इत्यादि शास्त्रसे प्रसिद्ध न्योन्यविलक्षणाः । तत्र कथमेक | औपनिषद पुरुष है । इस प्रकार ये एव आत्मा अद्वितीयः असंसा- | तीनों आत्मा एक दूसरेसे विलक्षण रीति ज्ञातुं शक्यते ? | हैं; अतः यह कैसे जाना जा सकता | है कि आत्मा एक, अद्वितीय और | असंसारी ही है ?

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