ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २ तत्र जीव एव तावत्कथं | सिद्धान्ती-इन तीनोंमें पहले ज्ञायते ? | जीवका ही ज्ञान कैसे होता है ? नन्वेवं ज्ञायते श्रोता मन्ता | पूर्व०-इस प्रकार ज्ञान होता है द्रष्टा आदेष्टा आघोष्टा विज्ञाता | कि 'वह श्रवण करनेवाला, मनन करनेवाला, द्रष्टा, आज्ञा करनेवाला, शब्द उच्चारण करनेवाला, विज्ञाता^२ प्रज्ञातेति । | और प्रज्ञाता^३ है।' ननु विप्रतिषिद्धं ज्ञायते यः | सिद्धान्ती-परन्तु, जिसका श्रवणादिकर्तृत्वेनामतो मन्ता- | श्रवणादिके कर्तारूपसे ज्ञान होता है उसे 'अमत और मनन करनेवाला, विज्ञातो विज्ञातेति च । तथा | अविज्ञात और विशेष रूपसे जानने- “न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न | वाला' इस प्रकार कहना तथा “मति-के मनन करनेवालेका मनन न करो, विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः” | विज्ञातिके विज्ञाताको न जानो” (बृ०उ० ३।४।२) इत्यादि च। | इत्यादि श्रुतिवचन भी विरुद्ध होगा । सत्यं विप्रतिषिद्धम्, यदि | पूर्व०-यदि उसे सुखादिके प्रत्यक्षेण ज्ञायेत सुखादिवत् । | समान प्रत्यक्षरूपसे जाना जाय तो प्रत्यक्षज्ञानं च निवार्यते “न | अवश्य विरुद्ध होगा । किन्तु “मतिके मनन करनेवालेका मनन न करो” मतेर्मन्तारम् मन्वीथाः” (बृ० | इत्यादि वाक्यसे उसके प्रत्यक्षज्ञानका उ० ३।४।२) इत्यादिना । | निवारण किया गया है। उसका ज्ञायते तु श्रवणादिलिङ्गेन; | ज्ञान तो श्रवणादि लिङ्गसे होता है; तत्र कुतो विप्रतिषेधः । | फिर इसमें विरोध कहाँ है ? ननु श्रवणादिलिङ्गेनापि कथं | सिद्धान्ती-श्रवणादि लिङ्गसे भी आत्माका ज्ञान किस प्रकार हो ज्ञायते ? यावता यदा शृणोत्या- | सकता है ? क्योंकि जब और जिस समय आत्मा सुननेयोग्य शब्दको त्मा श्रोतव्यं शब्दम्, तदा तस्य | सुनता है उस समय श्रवणक्रियाके १. सिद्धान्तीकी यह उक्ति पहले आत्मामें बतलाये हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि धर्मोंका प्रतिषेध करनेके लिये है। २. विशेष जाननेवाला । ३. सबसे अधिक जाननेवाला ।