भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३ स्वात्मभूतत्वादात्मा । तमात्मानं | ‘आत्मा’ है । शुकरूपसे गर्भीभूत रेतोरूपेण गर्भीभूतमात्मन्येव | हुए उस आत्माको पुरुष अपने स्वशरीर एवात्मानं बिभर्ति | शरीरमें ही धारण ( पोषण ) धारयति । | करता है । तद्रेतो यदा यस्मिन्काले | जिस समय भार्या ऋतुमती भार्यार्तुमती तस्यां योषाग्नौ स्त्रियां | होती है उस समय पिता उस सिञ्चत्युपगच्छन्, अथ तदैनदेत- | शुक्रको स्त्रीरूप अग्नि—अर्थात् द्रेत आत्मनो गर्भभूतं जनयति | स्त्री [ की योनि ] में उससे संयोग पिता । तदस्य पुरुषस्य स्थाना- | करके सींचता है उस समय वह न्निर्गमनं रेतःसेककाले रेतोरूपे- | इस शुक्रको अपने गर्भरूपसे उत्पन्न णास्य संसारिणः प्रथमं जन्म | करता है । इस प्रकार रेतःसिञ्चन- प्रथमावस्थाभिव्यक्तिः। तदेतदुक्तं | कालमें रेतोरूपसे अपने स्थानसे पुरस्तात् “असावात्मामुमात्मा- | निकलना ही इस संसारी पुरुषका नम्” इत्यादिना ॥ १ ॥ | प्रथम जन्म अर्थात् प्रथमावस्थाकी अभिव्यक्ति है । यही बात “असा- वात्मा अमुमात्मानम्” इत्यादि वाक्य- से पहले कही गयी है ॥ १ ॥

तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति । यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति ॥ २ ॥ जिस प्रकार [ स्तनादि ] अपने अंग होते हैं उसी प्रकार वह वीर्य स्त्रीके आत्मभाव ( तादात्म्य ) को प्राप्त हो जाता है । अतः वह उसे पीडा नहीं पहुँचाता । अपने उदरमें गये हुए उस ( पति ) के इस आत्माका वह पोषण करती है ॥ २ ॥