ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २ तद्रेतो यस्यां स्त्रियां सिक्तं | वह वीर्य जिस स्त्रीमें सींचा | जाता है उस स्त्रीके आत्मभाव सत्तस्या आत्मभूयमात्माव्यति- | अर्थात् पिताके शरीरके समान उसके | शरीरसे अभिन्नताको प्राप्त हो जाता रेकतां यथा पितुरेवं गच्छति | है । जिस प्रकार अपने अङ्ग स्तनादि प्राप्नोति यथा स्वमङ्गं स्तनादि | (देहसे पृथक् नहीं) होते हैं उसी | प्रकार यह भी हो जाता है । इसीलिये तथा तद्वदेव । तस्माद्धेतोरनां | यह गर्भ पिटक (आन्तरिक व्रणरूप | ग्रन्थि) आदिके समान उस माता- मातरं स गर्भो न हिनस्ति | को कष्ट नहीं देता । क्योंकि वह | स्तनादि अपने अङ्गके समान शरीर- पिटकादिवत् । यस्मात्स्तनादि- | से अभेदको प्राप्त हो जाता है इसलिये स्वाङ्गवदात्मभूयं गतं तस्मान्न | वह [किसी प्रकारका] कष्ट यानी | बाधा नहीं पहुँचाता—यह इसका हिनस्ति न बाधत इत्यर्थः । | तात्पर्य है । सा अन्तर्वत्न्येतमस्य भर्तुरा- | वह गर्भिणी इस अपने पतिके त्मानमत्रात्मन उदरे गतं प्रविष्टं | आत्माको यहाँ—अपने उदरमें प्रविष्ट बुद्ध्वा भावयति वर्धयति परि- | हुआ जानकर गर्भके विरोधी पालयति गर्भस्तरुद्धाशनादिपरि- | भोजनादिको त्यागकर अनुकूल हारमनुकूलाशनाद्युपयोगं च | भोजनादिका उपयोग करती हुई कुर्वती ॥ २ ॥ | उसका पालन करती है ॥ २ ॥ पुरुषका दूसरा जन्म सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स