भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या । एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥ वह [ गर्भभूत पतिके आत्माका ] पालन करनेवाली [ गर्भिणी स्त्री अपने पतिद्वारा ] पालनीया होती है। गर्भिणी स्त्री उस गर्भका पोषण करती है। तथा वह ( पिता ) गर्भरूपसे उत्पन्न हुए उस कुमारको प्रसवके अनन्तर पहले [ जातकर्मार्दि संस्कारोंसे ] ही संस्कृत करता है। वह जो जन्मके अनन्तर कुमारका संस्कार करता है सो इस प्रकार इन लोकों ( पुत्र-पौत्रादि ) की वृद्धिसे वह अपना ही संस्कार करता है, क्योंकि इसी प्रकार इन लोकोंकी वृद्धि होती है—यही इसका दूसरा जन्म है ॥ ३ ॥

सा भावयित्री वर्धयित्री भर्तु- | गर्भभूत पतिके आत्माकी वृद्धि रात्मनो गर्भभूतस्य भावयितव्या | करनेवाली वह स्त्री अपने स्वामीद्वारा वर्धयितव्या रक्षयितव्या च | वर्द्धयितव्या—पालनीया होती है, भर्त्रा भवति । न ह्युपकार- | क्योंकि लोकमें उपकार-प्रत्युपकारके प्रत्युपकारमन्तरेण लोके कस्य- | बिना किसीके साथ किसीका सम्बन्ध चित्केनचित्सम्बन्ध उपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है। जन्म होनेसे तं गर्भं स्त्री यथोक्तेन गर्भधारण- | पूर्व उस गर्भको वह स्त्री गर्भधारणकी विधानेन बिभर्ति धारयत्यग्रे | यथोक्त विधिसे धारण-पोषण करती प्राग्जन्मनः । स पिता अग्र एव | है। तथा वह पिता [जन्म होनेके बाद] पूर्वमेव जातमात्रं जन्मनोऽध्यूर्ध्वं | पहले ही जन्म लेते ही उस कुमारका जन्मनो जातं कुमारं जातकमां- | जन्मके अनन्तर जातकर्मादिद्वारा दिना पिता भावयति । स | संस्कार करता है। वह पिता जो जन्म- पिता यद्यस्मात्कुमारं जन्मनो- | के अनन्तर उस सद्योजात कुमारका