भारतकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५ येन वा जिह्वाभूतेन स्वादु चास्वादु | करता है और जिस रसनेन्द्रियभूतसे च विजानातीति ॥ १ ॥ | वह स्वादु-अस्वादु पदार्थोंको जानता | है ॥ १ ॥ प्रज्ञानसंज्ञक मनके अनेक नाम किं पुनस्तदेवैकमनेकधा भिन्नं | पहले जो एक ही अनेक प्रकार- करणम् ? इत्युच्यते— | से विभिन्न करण बतलाया है वह | कौन है ? इसपर कहते हैं— यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥ यह जो हृदय है वही मन भी है। संज्ञान ( चेतनता ), आज्ञान ( प्रभुता ), विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, जूति ( रोगादिजनित दुःख ), स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु, असु ( प्राण ), काम और वश ( मनोज्ञ वस्तुओंके स्पर्शादिकी कामना )—ये सभी प्रज्ञानके नाम हैं ॥ २ ॥ यदुक्तं पुरस्तात्प्रजानां रेतो | पहले जो कहा है कि 'प्रजाओं- हृदयं हृदयस्य रेतो मनो मनसा | का रेतस् ( सारभूत ) हृदय है, | हृदयका सारभूत मन है, मनसे जल सृष्टा आपश्च वरुणश्च हृदयान्मनो | और वरुणकी सृष्टि हुई; हृदयसे मन मनसश्चन्द्रमाः । तदेवैतद्धृदयं | हुआ और मनसे चन्द्रमा। वह यह | हृदय ही मन भी है। वह एक ही मनश्च, एकमेव तदनेकधा । | अनेकरूप हो रहा है। इस एक एतेनान्तःकरणेनैकेन चक्षुर्भूतेन | अन्तःकरणसे ही नेत्ररूपसे रूपको