ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ करणसंहतिरूपश्च प्राण इत्य- 'प्राण इन्द्रियोंका संघातस्वरूप वोचाम प्राणसंवादादौ । तस्मा- है' यह बात हम प्राणसंवाद द्यत्पद्भ्यां प्रापद्यत तद्ब्रह्म तदु- आदि प्रकरणोंमें कह चुके हैं । पलब्धुरुपलब्धिकरणत्वेन गुण- अतः जिसने चरणोंकी ओरसे प्रवेश भूतत्वान्नैव तद्वस्तु ब्रह्मोपास्या- किया था वह ब्रह्म उपलब्धामे त्मा भवितुमर्हति । पारिशेष्या- उपलब्धिका साधन होनेके कारण द्यस्योपलब्धुरुपलब्ध्यर्था एतस्य गौण होनेसे मुख्य ब्रह्म अर्थात् हृदयस्य मनोरूपस्य करणस्य उपास्य आत्मा नहीं हो सकता । वृत्तयो वक्ष्यमाणाः । स उपल- अतः पारिशेष्यनियमानुसार* जिस ब्धोपास्य आत्मा नोऽस्माकं भवि- उपलब्धाकी उपलब्धिका/उपलब्धिके तुमर्हतीति निश्चयं कृतवन्तः । हृदय एवं मनोरूप अन्तःकरणकी तदन्तःकरणोपाधिस्थस्योप- आगे बतलायी जानेवाली वृत्तियाँ लब्धुः प्रज्ञारूपस्य ब्रह्मण उप- होती हैं वह उपलब्धा ही हमारा लब्ध्यर्था या अन्तःकरणवृत्तयो उपासनीय आत्मा है–ऐसा उन्होंने बाह्यान्तर्वर्तिविषयविषयास्ता इमा निश्चय किया । उच्यन्ते । संज्ञानं संज्ञप्तिश्चेतन- उस अन्तःकरणरूप उपाधिमें भावः, आज्ञानमाज्ञप्तिरीश्वरभावः, स्थित प्रज्ञानरूप उपलब्धा ब्रह्मकी विज्ञानं कलादिपरिज्ञानम्, प्रज्ञानं उपलब्धिके लिये जो बाह्य और आन्तरिक विषयोंसे सम्बन्ध रखने- वाली अन्तःकरणकी वृत्तियाँ हैं वे ये बतलायी जाती हैं–'संज्ञान–संज्ञप्ति अर्थात् चेतनभाव, आज्ञान–आज्ञा करना अर्थात् ईश्वरभाव (प्रभुता), विज्ञान–कलादिका ज्ञान, प्रज्ञान–
- जहाँ आपाततः अनेकोंमेंसे किसी एक धर्म या गुणकी सम्भावना प्रतीत होनेपर भी और सबका प्रतिषेध करके बचे हुए किसी एक ही पदार्थमें उसका निर्णय किया जाता है वहाँ 'पारिशेष्यनियम' माना जाता है ।