अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद ६७
अपने पास ही रखलिया था।” बादशाह को भी बीरबल की बात सच्ची जान पड़ी, खबर नहीं कि आखिरस उसे रक्खा किस जगह । उसने हीरे का बहुतेरा खोज किया, परन्तु जब कहीं हो तब तो मिले वह तो मुख में गलकर पानी होगया था । लाचार होकर बादशाह बोला-“अच्छा बीरबल ! बुड्ढे व्यो- पारी से उसका मूल्य निश्चित कर लो, परन्तु उससे कोई झकझक न करना।” हुक्म मिलते ही बीरबल ने बूढ़े चाचां से हीरे का मूल्य पूछा। वह बोला-“दीवान जी! हीरे का असली मूल्य दो हजार मुहरें हैं और दो सौ मुहरें मैं नफे में लूँगा।” बीरबल ने कहा-“नहीं तुम्हें नफे में पचास मुहरें ही दी जायँगी। बूढ़ा दुखित मन से बोला-“सरकार ! यदि आपको मुनाफे की दो सौ मोहरें देनीं स्वीकार हों तब तो लेवें, नहीं तो कृपाकर मेरा माल मेरे हवाले करें।” बीरबल मूल्य में कमी कराने के लिये उससे बारबार बना- वटी माथापच्ची करता रहा, अन्त में झुरुलाकर बोला-“बुड्ढे ! इतनी टिरटिर क्यों करता है, अच्छा पचास मोहरें और ले लेना।” परन्तु बूढ़े चाचा तो पक्के गुरु के चेला थे भला वे कब मानने लगे। मुँह बनाकर बोले-“दीवान जी! इस प्रकार मुझ गरीब को क्यों दबाते हैं, मैं दो सौ मुँहरों से एक कौड़ी भी कम न लूँगा।” बादशाह इन दोनों की बड़ी देर की झक झक सुन क्रोधित होकर पूछा-“क्यों बीरबल ! व्योपारी क्या कहता है?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! वह हीरे की लागत दो हजार मुहरें बतलाता है और मुनाफे की दो सौ मुँहरें अलग से माँगता
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