अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ अकबर बीरबल विनोद है। मैं इसके नफे में कमी करवाता हूँ और केवल एक सौ मुँहरें ही देना चाहता हूँ।” बादशाह ने बीरबल को इशारे से मना किया और उदारतापूर्वक बूढ़े जौहरी को हीरे का मूल्य और दो सौ मुनाफे की मुहरें खजाँची से दिलवा कर विदा किया। वृद्ध की प्रसन्नता बाँसों उछल पड़ी और मनोमन बीरबल को कोटिशः धन्यवाद देता हुआ अपने घर चला गया। शाम को दरबार से अवकाश पाकर जब बीरबल घर पहुँचा तो जौहरी बूढ़े चाचा को प्रस्तुत पाया। बूढ़ा बीरबल को देखकर प्रसन्नता से रोमांचित हो गया और बोला— “आपको और आपकी बुद्धि को धन्य है, दीवान साहब ! आपजो मुझ सरीखे दीनों पर उपकार कर रहे हैं उसका फल ईश्वर आपको हाथों हाथ देगा। मुझे विश्वास हो गया है कि इस पृथ्वी मंडल पर आप ऐसा प्रजापालक दूसरा दीवान नहीं है। उसकी ऐसी अनेकों प्रशंसा की बातें सुनकर उसके सन्तो- षार्थ बीरबल ने कहा-“चाचाजी ! इसमें मेरा क्या उपकार है। यह सब आपको आपकी बुद्धिमानी का प्रतिफल मिला है” बुड्ढा इस पर आवाक हो गया और कोटि कोटि आशीर्बाद देता हुआ अपने घर चला गया। नकली बीरबल जब से बादशाह को बीरबल के मृत्यु का समाचार मिला था तबसे उसके विछोह के कारण बड़ा दलगीर रहता और बराबर