अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०० अकबर बीरबल विनोद वातें भलीभाँति स्मरण कर लिया था जिस कारण बीर- बल सम्बन्धी प्रश्न उपस्थित होने पर वह उसका उचित उत्तर देता था । कितने ही लोगों को धोखा हो गया । वे उसे असली बीरबल समझकर बादशाह के पास पहुँचाने आये परन्तु वह रास्ते में ही स्वर्गवासी हो गया । बादशाह उसकी प्रतीक्षा करता रहा । ऐसी ही ऐसी और भी कितनी अफवाहें बादशाहके कान तक पहुँचीं, परन्तु जब उनकी जाँच कराई गई तो सारी बातें झूठी निकलीं । उसके गुप्तचर सच्ची खबर नहीं देते थे जिससे कालान्तर में उनका भेद खुल गया । बादशाह दूतों के ऐसे विश्वासघात करने पर आग बबूला हो गया और उनको कठिन दण्ड दिया । खुदा को अक्ल से पहचान करो बादशाहों की सभा में चित्रकारों के रहने की पुरानी प्रणाली है । अकबर बादशाह के दर्बार में भी नियम-परम्परा के अनुसार कई चित्रकार विद्यमान थे । उनमें एक सर्व- प्रधान था । वह प्रति चित्र के बनवाई में पाँच हजार पुरस्कार लेता था । एक दिन उस चित्रकार के पास एक बड़ा आदमी आया और बोला- "महाशय जी ! मुझे भी अपनी चित्र बनवानी है; यदि आप उसे सर्वांगपूर्ण बना सकेंगे तो मैं आप को पन्द्रह हजार रुपया इनाम दूँगा । चित्रकार सहमत हो गया और दूसरे ही दिन से चित्र बनाना शुरू किया । इस काम के सम्पादन में उसे कई मास का अरसा लगा । जब चित्र उसकी इच्छा नुकूल तय्यार हो गया तो उसे लेकर रईस