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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद १०१

के पास गया। वह चित्र को लेकर अपने चेहरे से भलीभाँति मिलान किया। उसमें एक स्थानपर ऐब रह गया था। साहूकार ने चित्रकार को उसे दिखलाया। वह विवश होकर दूसरा चित्र बना लाने का बचन देकर खाली हाथ लौट गया और फिर से चित्र बनाना प्रारम्भ किया। इस बार पहले से भी अधिक तत्परता से चित्र तय्यार किया। उसका विश्वास था कि इस मर्तवा साहूकार को चित्र पसंद आजायगा। दूसरे दिन फिर चित्र को लेकर शाहूकार के पास पहुँचा और पुरस्कार का दावो हुआ। भलेमानस ने चित्रका फिर से मिलान किया, फिर भी उसके गोड़ में ऐब रह गया था। इसी प्रकार सेठ और कई बार चित्रकार कोमूर्ख बनाकर लौटा चुका था। मनुष्य अपनी काम- याबी के लिये बार २ परिश्रम करता है, जब करते २ थक जाता है तो उसकी हिम्मत छूट जाती है और फिर उसके किये वह काम नहीं होता। इसी प्रकार वह चित्रकार भी अपनी नाकामयाबी से हताश हो गया और अपनी अपकीर्ति जन समुदाय में बढ़ने के भय से गंगा में डूब मरने का संकल्प किया। जिस समय गंगा तट पर पहुँचकर वह आत्मविसर्जन का उपाय सोच रहा था उसी समय हरेच्छा से बीरबल नामी एक ब्राह्मण का दीन लड़का भी वहाँ उपस्थित था। लड़का चित्रकार के मनोगत भावों को ताड़ गया और उसे ढाढ़स देने के विचारसे पूछा—"महाशय जी ! आप इतना चिन्ताग्रस्त क्यों दिखाई पड़ते हैं, जान पड़ता है चिन्ता रूपी साँपिन ने आपको डस लिया है ? कृपाकर मुझसे अपने दुख का कारण