अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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साफ २ बतलाइये, मैं यथासक्य उसके निवारण का प्रयत्न करूंगा। बालक के ऐसे विनम्र वचनों से चित्रकार की जीवन आशा पुनः जागृत हुई और अपना दुःखद समाचार कहकर सुनाया। लड़का बोला- "आप इस थोड़ी सी बात के लिये इतना अधीर क्यों हो रहे हैं ? धैर्य्य धारण कीजिये, मैं उसका तद्रूप चित्र बना दूँगा और फिर उसे ऐब दिखलाने का अवसर न मिलेगा, केवल थोड़ा और परिश्रम कर मुझसे उसका साक्षात्कार करा दें। चित्रकार लड़के को साथ लेकर उस रईस के पास गया, बीरबल उस रईसको फाँसने के लिये रास्ते में ही एक तरकीब सोच चुका था वह बाजार से एक शीशा खरीदकर अपने साथ लेता गया, चित्रकार को देखकर उक्त रईस ने पूछा- "क्या दूसरा चित्र तय्यार होगया ?" बीरबलने उत्तर दिया- "हाँ तैयार करके लाया है।" चित्रकार आगे बढ़कर रईस को अपना दर्पण दिखलाया। दर्पण में रईस को अपना स्वरूप ठीक ठीक दीख पड़ा, फिर उसे आना कानी करने की कोई दूसरी तरकीब नहीं सूझी; लाचार होकर कौल के अनुसार पन्द्रह हजार रुपये देने पड़े। चित्रकार बीरबल की ऐसी युक्ति से बड़ा सन्तुष्ट हुआ। वह रुपया लेकर घर लौट गया, परन्तु बीरबल रईस का चरण पकड़ कर बोला- "भगवन् ! मैं आपको अब नहीं छोड़ूँगा क्योंकि आप मुझे मनुष्य के रूप में देवता जान पड़ते हैं।" बीरबल की हठधर्मी से विवश होकर देवता ने प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और उसको बुद्धि बढ़ने का आशीर्वाद दिया। फिर बीरबल को सन्तुष्ट कर देवता अन्तर्ध्यान हो गये। चित्र में