अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ अकबर बीरबल विनोद मालूम नहीं था । अपना समूचा परिवार दिल्ली में ही छोड़ गया । येनकेन प्रकारेण कई महीना बीत गया, पर न बीरबल को दरबार का समाचार मिला और न बादशाह को बीरबल का ही । नया दीवान बीरबल के टक्कर का नहीं था, इसलिये बाद- शाह का दिल उसपर भलीभाँति जमता न था। वह गुप्तरूप से एक दूसरे दीवान की खोज में था। कितनों की गुप्त छिपे रूप से परीक्षाएँ ली, परन्तु कोई उत्तीर्ण नहीं हुआ। तब लाचार होकर उसे विज्ञापनबाजी करने की धुन सवार हुई, उसने शहर शहर और दिहात २ में यह घोषणा करवा दी कि जो कोई मेरे प्रश्नों का उचित उत्तर देगा वह नया दीवान बनाया जायगा, उत्तर न दे सकने पर उसपर कुछ विचार न किया जायगा । दरबारी लोग दीवान पद के लिये लालायित हो रहे थे; परन्तु परीक्षोत्तीर्ण होना कठिन समझ, उपहास के भय से खामोश रह गये । बादशाह ने अपनी घोषणा में एक मास की निश्चित तिथि निर्धारित की थी । समय अबकरीब आपहुँचा और सभा का आयोजन किया गया। यह सभा दीवान के चुनाव की थी अतएव इसमें आम जनता को जाने का हुक्म नहीं था, केवल दरबार के लोग और कुछ वे लोग सम्मिलित किये गये जो दीवान पद के प्रलोभन से उम्मीदवार बन आये थे । उन उम्मीदवारों में एक आदमी ऐसा आया था जो देखने में बड़ा प्रतिभाशाली जान पड़ता था, उसकी दोनों आँखें बड़ी बड़ी और चमकीली थीं, सिर पर सफेद पगड़ी