अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबल बीरबल विनोद १०९ बाँधे हुए था, दाढ़ी छाती तक लटक रही थी। उसके कुछ केस काले ओर कुछ सफेद थे। जिससे देखने में अधेड़ जान पड़ता था। बादशाह की आज्ञा से एक परोक्षक बोला-“आज की सभा में जो मनुष्य उत्तीर्ण होगा वह दोवान पद पर नियुक्त किया जायगा। यदि उत्तर देने में भूल होगी तो दुबारा उसकी सुनवाई न होगी। पहला प्रश्न यों है (१) इस भौगोलिक सागर में मोती की सीपियों की गणना क्या है?” मैं ऊपर लिख चुका हूँ कि दीवान पद प्राप्त करने के लिये पाँच उम्मीदवार आये थे सो उनमें चार तो इस प्रश्न को सुनते ही विचार सागर में निमग्न हो गये, परन्तु पाँचवाँ व्यक्ति जो कि साफा बाँधकर आया हुआ था और जिसकी दाढ़ी छातीतक लटक रही थी, उत्तर देने के लिये बड़ा उत्सुक जान पड़ा। बारी बारी सब से उत्तर माँगा गया। किसीने कहा-लाख, किसीने करोड़ और किसीने अरब तक की संख्या बतलाई, परन्तु साफे वाला मनुष्य सबके अन्त में बोला- “सम्पूर्ण मनुष्यों की आँखों की जितनी गणना है उतनी ही सीपियों की भी है।” उसका उत्तर सुनकर चारो तरफ से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह भी मन में प्रसन्न हुआ। नियमानुसार चारो उम्मीदवार नाकामयाब हो गये एक साफे वाला ही बच रहा। प्रश्नकर्त्ता ने दूसरा प्रश्न किया- “इस शरीर का पहला सुख क्या है?” तब साफे वाले ने कहा-“हेल्थ इज दी रूट आफ हैप्पीनेस” शरीर के लिये स्वस्थ