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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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अकबर बीरबल विनोद १२६

सबकी मति एक समान ही देख पड़ती है।” बादशाह बोला-“भला यह कैसे हो सकता है कि बुद्धि तो जुदी जुदी हो और विचार सबका एक हो?” बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! “हाथ कंगन को आरसी क्या।” यदि आपको प्रमाण की आवश्यकता हो तो मैं कल्ह ही सिद्ध करके दिखला देने को तय्यार हूँ।” बादशाह ने कहा-“बहुत बेहतर ।” दूसरे दिन प्रातः काल बीरबल ने बादशाह की अनुमति प्राप्तकर सरकारी बगीचे का एक बड़ा हौज़ जो पानी से लबालब भरा था रिक्त करवा दिया और सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब लोग अपने अपने घरों से एक एक घड़ा दूध लाकर हौज़ को भरें। फिर हौज़ के ऊपर एक सफेद चादर बिछवाकर उसे भलीभाँति ढक दिया। ऐसी तरकीब कर बादशाह को देखने के लिये बुलवा भेजा। समय रात्रिका था लोगों ने विचार किया कि जब हौज़ में इतना घड़ा दूध पड़ेगा तो भला उसमें एकाध घड़ा जल छोड़ देने से खराबी क्या खराबी होगी । इसी विचार से प्रत्येक घरों से दूध की जगह पानी ही डाला गया। अँधेरी रात में किसी को भी न सूझा कि हौज़ में सभी लोग पानी ही छोड़ रहे हैं। उनका निजी अनुमान था कि मेरे सिवा अन्य नागरिक हौज़ को दूध ही से भर रहे हैं? यदि किसी ने साहस कर देखा भी तो चादर की सफेदी के कारण दूध का भ्रम हो गया, पानी तो नीचे छिपा हुआ था जब सबेरा हुआ तो बादशाह बीरबल के साथ हौज़ का दूध