अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद १३० बिदा हो एक दूसरे धनी के घर जा पहुँचे। यह धनी अपनी दयालुता के कारण सारे नगर में विख्यात हो रहा था। बाद- शाह ने उससे भी अपनी वही पहली युक्ति निकाली, यानी अपने को बहुत थका माँदा बतलाकर थोड़ी देर के लिये आश्रय माँगा। वह रईस बादशाह की थकावट सुन दयार्द्र हो कर बोला- “मियाँ मुसाफिर! यह घर आपका ही है, आप सानन्द जितनी देर जी चाहे विश्राम कर लो, वह सामनें कई चारपाइयाँ पड़ी हुई हैं। वहाँ पर आपको सब प्रकार का सुपास मिलेगा।” बादशाह ने कहा-“महाशय जी! मैं अपने भार से आपको दबाने नहीं आया हूँ, बल्कि थोड़ी थकावट मिटाकर राही हो जाऊँगा।” फिर उन दोनों में देशकाल की बातें छिड़ीं। बातों २ में फँसाकर बादशाह ने फिर उससे वही बात छेड़ी। तब रईस बोला-“भाई ! किफायत सभी को पसन्द है, दूसरे लोगों ने चाहे भले ही दूध डाला हो; परन्तु मैंने तो पानी ही डाला है। बादशाह ने कहा-“परन्तु इसपर आपने आगा-पीछा का विचार नहीं किया नहीं तो दूध की जगह पानी न डालते। अगर किसी प्रकार यह बात बादशाह को प्रगट हो जायगी तो आप राजाज्ञा भंग करने के अपराधी होंगे।” धनाढ्य ने कहा- “सिवा मेरे और आपके दूसरा कोई भी मनुष्य इस बात को नहीं जानता। यदि तुम नहीं कहोगे तो बादशाह किसी प्रकार नहीं जान सकता।” बादशाह ने अपना नकली लिवास उतार कर अलग रख दिया और उसके देखते २ असली लिवास में हो गया। “काटो तो बदन में लोहू नहीं।” विचारा धनाढ्य एकदम ठिठुक गया