अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३१ अकबर बीरबल विनोद उसके हवास गुम हो गये । तब बादशाह उसे आश्वासन देते हुए बोला-“चिन्ता करने की कोई बात नहीं है, जैसे आपने किया है उसी प्रकार सभी लोग अपने २ घर किया करते हैं, परन्तु उसके लिये किसी को दण्ड नहीं दिया जाता।” उसे धीरज दे बादशाह शाही पोशाक बदल कर चला गया और बीरबल के पाण्डित्य की सतत प्रशंसा की ।
थोड़ा और बहुत एक दिन बीरबल अपनी छोटी कन्या को साथ लेकर दर्बार में गया । पहले बादशाह ने उस का बहुत प्यार किया जब वह प्रसन्न होकर कुछ बातें करने को उद्यत हुई तो बाद- शाह ने पूछा-“क्यों बेटी ! क्या तुम बातें करना जानती हो ?” तब उस लड़की ने जवाब दिया-‘थोड़ा और बहुत ।’ बादशाह ने पूछा-इस “थोड़ा और बहुत” का क्या मतलब है?” लड़की बोली-“सरकार ! इसका मतलब यह है कि बड़ों से थोड़ा बोलना जानती हूँ और छोटों से बहुत ।” उस लड़की की ऐसी बुद्धिमत्तापूर्ण बातें सुनकर बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई, और बीरबल के घराने की स्वाभाविक हाजिर जवाबी पर ईश्वर को कोटिशः धन्यवाद दिया । —:०:*:०:— घुँघची की माला एक दिन धार्मिक बातों पर चरचा छिड़ी तो बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल ! तुम्हारे कृष्ण