अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५१ अकबर बीरबल विनोद यकीनशाह पीर आज बादशाह अपनी वर्षगाँठ मना रहा था, दूर-दूर के लोग इस उत्सव में अपना २ तोहफा लेकर आये हुए थे, एल- चियों की तो मानो भरमार हो रही थी। जो आता अपनी नजर गुजार कर किसी रिक्त स्थान पर बैठ जाता। दरबारी लोग अपने २ आसनों पर मूर्तिमान बैठे हुए थे। शामियाने के अन्दर वेश्याओं का गान और वाद्य भी साथ ही साथ होता जा रहा था। बादशाह अपने दर्बार की सजावट देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे अपने दरबारियों की बुद्धि और कला विशेषता पर बड़ा गर्व था। उसका ख्याल था कि उसके मंत्री के समान बुद्धिमान कहीं दुनियाँ के पर्दे में दूसरा मंत्री नहीं है। बादशाह के दरबार में फकीर और मौलवियों का जम घट लगा हुआ था क्यों कि आज उसने हजारों फकीर जिमाये थे और बहुतेरों को मुँह माँगा दान दिया था। इसी समय बादशाह का सबसे बड़ा पीर आया। बादशाह ने भी पीर साहब की बड़ी आव भगत की और उन्हें सर्वोत्तम पदार्थ भेट में दिया। हर तरफ प्रसन्नता का साम्राज्य था जिधर देखो उधर लोग बादशाह को दुवा देते सुनाई पड़ते थे। इस नजारे को देखकर बीरबल हँस पड़ा ? उसकी हँसी से बादशाह को नाराजगी तो नहीं हुई, परन्तु वह कुछ क्षुब्ध सा अवश्य हो गया। जब सब लोग चले गये तो बादशाह ने बीरबल से पूछा- "क्यों बीरबल बतला सकते हो की पीर बड़ा होता है वा यकीन।" बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ ! यकीन बड़ा