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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद १५६ इस मन्नत पर बादशाह ने हँस दिया और उसे संबोधन कर बोला—"क्यों बीरबल अब तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ गई; आखिरश लाचार होकर तुम्हें भी मानता माननी ही पड़ी।" बीरबल ने उत्तर दिया—"बेशक ! पीर साहब की ही शरण लेनी पड़ी।" पश्चात् वह सब दरबारियों सहित कबर के समीप जा पहुँचा और उसके बीच वाला पत्थर अपने हाथ से उठाकर अलग रख दिया और उसके भीतर से उस गठरी को निकाल कर बाहर किया। बादशाह इस बात को देखकर बड़ा हैरान हुआ और बीरबल से उसका कारण पूछा। बीरबल ने उत्तर दिया—"पृथ्वीनाथ ! यही आपके यकीन- शाह पीर हैं और आपने इन्हीं की मानता की थी। बादशाह को उस शाल की गठरी के भीतर अपने जूते की पवाई देख- कर बड़ा आश्चर्य हुआ और लज्जित होकर अपनी गर्दन नीची कर ली। बीरबल बोला—"गरीबपरवर ! अब आप ही फर्मावें कि आस्था बड़ी है वा पीर।" अपने मनका विश्वास ही मुख्य है। जब विश्वास नहीं रहता तो मानता भी निष्फल हो जाती है। इसलिये आपको कहना पड़ेगा कि मुख्य विश्वास ही है।" बादशाह ने बीरबल की बात मान ली। यकीनशाह की बड़ी शोहरत हो गई थी जिस कारण वहाँ पर काफी धन संचित हो गया था। उस धन से बीरबल ने वहाँ पर एक मसजिद बनवा दिया। बीरबल की बुद्धिमानी से बादशाह को मात होना पड़ा।

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