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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद १९८ खुली और नशे का झोका टूटा तो अपने को एक अपरिचित स्थान में पाया। उन्हें सन्देह हुआ-“क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ?”, बेगम सामने पंखा झल रही थी बादशाह नेउससे पूछा-“क्या तुम बतला सकती हो कि मैं इस समय सोया हूँ अथवा जाग रहा हूँ।” बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामीनाथ ! पहले आप सो रहे थे, परन्तु अब सबेरा होने पर आपकी निन्द्रा भंग हो गई है। उठिये हाथ मुँह धोकर नमाज पढ़ लीजिये। बादशाह बोले-“पहले बतलाओ कियह किसका महल है और हम कहाँ पर आये हुए हैं।” बेगम ने अपना दोनों हाथ जोड़कर कहा- “प्रभु ! यह आप की ससुराल यानी मेरे पिता का घर है। मैं भी आपकी आज्ञा पालन करने के लिये यहाँ पर आई हूँ।” बादशाह ने फिर पूछा-“तब मैं कैसे आया।” बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामी ! आपने मुझे आज्ञा दी थी कि जो तुम्हारी सब से प्यारी वस्तु हो उसे अपने साथ लेती जाओ।” मैं ईश्वर की साक्षी देकर कहती हूँ कि महल भर में ही नहीं बल्कि समस्त ससार में आपसे बढ़कर मुझे कुछ भी प्यारा नहीं है। इसलिये मैं आपको अपने साथ लेकर यहाँ चली आई हूँ।” बेगम के ऐसे अनुराग को देखकर बादशाह दयार्द्र हो गये और उसके अपराधों की माफी दी। फिर अपने ससुर से मिल भेट सबकी राजी कर सास ससुर की अनुमति से उसी दिन बेगम के सहित अपने नगर को लौट आये। कुछ दिनों के बाद जब फिर बेगम और बादशाह में भली भाँति प्रेम हो गया तो एक दिन ससुराल जाने वाली बात बादशाह के ध्यान में आ गई; तुरत बेगम से पूछा-“प्रिये ! क्या