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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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१६६ अकबर बीरबल विनोद तू बतला सकती हो कि उस रोज तुम किसकी सम्मति से मुझे अपने पीहर ले गई थी।” बेगम ने उत्तर दिया-“स्वामी ! वह आपके चतुर दीवान बीरबल की सम्मति थी। उन्हीं की कृपा से मुझे आप फिर से प्राप्त हुए हैं।” बादशाह बीरबल पर प्रसन्न होकर उसे बहुत धन्यवाद दिये। दीवान और काना नाई एक दिन बीरबल गुप्त रूप से नगर पर्यटन के लिये निकला था। घूमते २ वह एक ऐसे स्थानपर जा पहुँचा जहाँ कि एक अमीर एक युवती कन्यापर बलात्कार करने की चेष्टा कर रहा था। यह युवती कुमारी कन्या थी। इसके रूप और यौवन को देखकर वह यवन मोहित हो गया था। वह बहुत दिनोंसे उसे फाँसने की चेष्टा में लगा हुआ था, परन्तु वह उसे अपने पास नहीं फटकने देती थी। आज अचानक किसी प्रकार उधर आ पड़ी थी इसलिये वह अपने कलुषित हृदय की अग्नि शान्त करने की फिराक में पड़ा हुआ था। उस कुमारिका के भाग्यवश उसी समय बीरबल भी वहाँ जा पहुँचा। बीरबल की पोशाक मुसलमानी ढंग की देखकर उस यवन ने मुसलमान समझकर बीरबल से बोला-“महाशयजी ! आप भी मुसलमान ही जान पड़ते हैं यदि आप में कुछ भी मजहब का जोश हो तो इस समय मेरी सहायता करें। यह हमारी स्त्री है, यह एक हिन्दू के बहकावे में आकर उसके साथ जाना चाहती है, और पूछने पर अपने को हिन्दू बतलाती है।