अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद २१८ बड़ी शोहरत हो गई थी इसलिये दोनों तरफ से बहुतेरे लोग फैसला सुनने के लिये आये। बीरबल ने चुपके से एक सिपाही को आज्ञा दी कि इस भीड़ में घुसकर सुभद्रा सुभद्रा कई बार पुकारा, जो कोई नाम को सुनकर कुछ भी संकुचित हो उसे पकड़ कर मेरे पास हाजिर करो। सिपाही ने चिल्लाकर सुभद्रा को पुकारा। उसके पुकारते ही सब लोग सन्न हो गये; परन्तु वह कन्या चुपके से खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी। सिपाही बीरबल की आज्ञानुसार उसका हाथ पकड़ लिया और उसे उस के पास ले आया। वेश्या भी लड़की के साथ हो ली।' बीरबल ने कन्यासे पूछा— "क्यों री! तेरा नाम तो काशी है न, फिर तू सुभद्रा के नाम से क्यों खड़ी हो गई।" लड़की ने उत्तर दिया- "सरकार! मेरे पिता मुझे सुभद्रा के नाम से ही पुकारते थे। अतएव सुभद्रा नाम के सुनते ही मेरे कान खड़े हो गये।" बीरबल ने कहा- "अभी तू कल अपने बयान में कह चुकी है कि मैं अपने पिता को नहीं जानती और आज इस प्रकार कहती है?" वह लड़की चक्कर में आ गई और डरवश थरथर काँपने लगी। वेश्या बीच बीचमें अपने बचन की पुष्टि के लिये बोलना चाहती थी; परन्तु बीरबल ने उसको डाटकर रोक दिया। वे बोले- "तू झूठी साबित हो चुकी है क्योंकि तेरे बयानों में अन्तर पड़ रहा है। मैं इस मिथ्या के बदले तुझे अभी दण्ड देता हूँ। यह कह कर बीरबल ने एक कर्मचारी से कुछ सांकेतिक