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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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२१६ अकबल बीरबल विनोद

भाषण किया। कर्मचारी आज्ञा पाते ही एक कोड़ा हाथ में लेकर सामने आया। उसे देखकर वेश्या डर गई, और तुरत अपना कसूर गरदान लिया।” वह बोलो-“पृथ्वीनाथ ! मैं इस कन्या को आज से तीन चार वर्ष पहले एक आदमी से खरीदा था। वह आदमी मुझे झाँसा पट्टी पढ़ा इसके बदले में काफी धन हड़प ले गया है। आप मेरे अपराधों को क्षमा करें।” लड़की का पिता बीरबल के इसारे से अपनी कन्या के पास खड़ा हो गया; बीरबल ने उस लड़की से पूछा-“क्या तू इस आदमी को पहचानती है ? क्या इसकी शक्ल तेरे पिता से मिलती है ?” लड़की को डर उत्पन्न हो गया, उसने सोचा कि अगर झूठ बोलती हूँ तो बीरबल बीच सभा में कोड़े लगवावेगे। अतएव सच बोलना ही अच्छा है। उसने कहा-“हाँ हाँ यही मेरे जन्मदाता पिता हैं।” इतना कहकर वह अपने पिता के चरणों पर गिर पडी, पिता ने उसे उठाकर छाती से लगा लिया। बीरबल ने कहा-“वेश्या अब तेरे पास और कोई सफाई देने की बात नहीं रही, तू एक साथही तीन अपराधों में गिरफ्तार हुई है। पहला अपराध अबोध कन्या के फुसलाने का, दूसरा दास ब्योसाय को तरक्की देने का और तीसरा धोखा देने का है। इसलिये तुमको सात वर्ष की सजा दी जाती है।” वह सिपाहियों द्वारा तत्क्षण कैद करली गई और वे उसे लेकर कारागृह का मार्ग लिये। तब बीरबल उस वृद्ध पुरुष को समीप बुलाकर बोले-“मैं तुम्हारी कन्या को तुम्हें देता हूँ, परन्तु साथही इस बात की हिदायत भी करता हूँ कि अब यह लड़की तुम्हारे यहाँ न रह सकेगी, इसलिये