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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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अकबर बीरबल विनोद २२६ से बने हुए गहनों में फरक नहीं पड़ेगा। दूसरे सुनारों का क्या विश्वास । वह अपना सब सोना भाई को देकर आप उसके पास बैठकर गहने बनवाने लगी। उसका बूढ़ा बाप भी वहीं दूकान में बैठा हुआ था। बूढ़े ने मन में अनुमान किया- "जो मैं लड़के से प्रगट रूप में कहता हूँ तो लड़की सारी बातें जान जायगी और यदि नहीं कहता हूँ तो लड़का बहन के गहने सोच कर उसमें से चोरी नहीं करेगा। तब तो मेरे इस पेशेका नाम कलंकित होगा।" वह अँगड़ाई लेता हुआ बोला-"अरे राम अपने लिये तो सभी एक समान हैं।" ठग जाने ठगही की भाषा, ताते उमा गुप्त करि राखा।" वाली घटना घटी। लड़का बाप की शिक्षा से धीरे धीरे पंडित हो चुका था। उसने अपने पिता के कहने का भावार्थ समझ लिया; परन्तु प्रगट रूप से पिता को कुछ उत्तर नहीं दिया । बूढ़े ने समझा कि शायद लड़के को मेरा सांकेतिक शब्द समझ में नहीं आया अतएव रह रह कर वही पहले वाला शब्द पुनःपुनः कहने लगा। लड़का दत्तचित्त हो अपनी बहन से बातें करता हुआ गहने गढ़ रहा था। पिता के बारबार के टोकारे से खीझ कर बोला-"पिता जी ! आज आप इतना राम राम क्यों कह रहे हैं। अरे राम ने तो बहुत पहले ही लंका नगरी को लूट लिया था, अब उसमें रक्खा ही क्या है। अपने लाड़िले से ऐसा सन्तोषप्रद उत्तर पाकर वृद्ध गद- गद हो गया और उसे अपने पुत्र पर बहुत भरोसा हुआ।