अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२७ अकबर बीरबल विनोद वह लड़का “कौवा से कबेला चतुर ।” वालो कहावत पहले ही चरितार्थ कर सोने की एक गुल्ली माल में से कपट कर राख में छिपा दिये था। इस घटना को सुनकर बीरबलने कहा- “पृथ्वीनाथ! कारीगर बड़े बज्र बेहया होते हैं। वे अपने कला में जब तक चोरी करना नहीं जानते तबतक उनको अपने कारीगर होने में सन्देह ही बना रहता है। आप इसे पक्का समझें कि जो जितना बड़ा कारीगर होता है वह उतनाही चोर भी होता है। यही इनकी विशेषता है कि माल चुरा लेते हैं और दूसरों पर इनका भेद प्रकट नहीं होने पाता। सुनार तो शास्त्रों द्वारा इस फन में विख्यात हैं। इनका नाम शास्त्रकारों ने “पश्यतो हर” बतलाया है। इसका भावार्थ यह है कि यह आँख के सामने ही चोरी करते हैं, परन्तु देखने वालों की बुद्धि कुछ काम नहीं करती।” व्यसनी की लत एक दिन बादशाह बीरबल के साथ नगर में होकर हवा खोरी के लिये निकला था। एक जगह नुक्कड़ पर उसे एक औरत दिखाई पड़ी। वह महा फूहड़ देख पड़ती थी। उसके मोटे मोटे होठों के बीच से दो बड़े २ दाँत बाहर को झाँक रहे थे। नाक से पोटा जारी था। मलीन वस्त्र, खुले बाल और शरीर पर मिट्टी पानी मिश्रित दाग पड़े हुए थे। बात करते समय मुँह से थूक बाहर निकला आता था। कहाँ तक कहें वह सर्वांग फूहड़ थी। राजा की तो बात ही अलग है, उसके