भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 292 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 251

२३७ अकबर बीरबल बिनोद शाही रामायण एक दिन बीरबल और बादशाह की एकान्त में बातें हो रही थीं। इसी बीच बादशाह ने बीरबल से शाही रामायण बनाने की चर्चा की। बीरबल बोला-“पृथवीनाथ ! यह कौन बड़ी बात है। शाही रामायण मैं बनाकर आपको दिखलाऊँगा; परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है जो थोड़े समय में कर दिखाया जाय। इसमें तीन माँस की देर लगेगी और रुपये भी काफी खर्च पड़ेंगे। इस समय मैं खर्च के रुपयों का ठीक- ठीक आँकड़ा तो नहीं बता सकता, परन्तु इतना है कि पहले पहल कार्यारम्भ के लिये मुझे १५ हजार रुपये मिलने चाहिये। बादशाह ने खजाने से पन्द्रह हजार रुपये दिलाकर बीरबल को तीन मास की मुहलत दे शाही रामायण तय्यार करने के लिये विदा किया। वह रुपयों को लेकर सीधे अपने घर पहुँचा और उनसे स्थान २ पर मौका देखकर कुँआँ बावली खुदवाने का कार्यारंभ किया। इस प्रकार जब दो मास समाप्त होकर तीसरा भी समाप्त होने पर आया तो बीरबल को शाही रामायण की सूझी। वह बाजार से कोरा कागज मँगाकर उसकी एक मोटी पुस्तक तय्यार कराई और फिर उसे एक आदमी के सिर पर रख कर बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह को पुस्तक दिखाकर बोला-“पृथिवीनाथ ! अबतक रामायण तय्यार हो गई होती; परन्तु अभी इसमें कुछ काम बाकी हैं; जिसकी पूर्ति के लिये आपके पास आना पड़ा। कृपा