भारतकोश
अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

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१६ अकबर बीरबल विनोद अधिक बोलने का अभ्यास नहीं है । बीरबल दोनों स्त्रियों को वहीं रोक कर अपने एक सच्चे सेवक के कान में कुछ समझा कर उनके घर भेजा । वह उन स्त्रियों के चालचलन की जाँच कराना चाहता था । नौकर आज्ञा पाते ही उस महाल में गया; जहाँ ये रहती थीं । वह उनके अड़ोस पड़ोस के तमाम लोगों से उनके चाल चलन के संबंध में पूछ-ताछ की । उनकी जबानी मालूम हुआ कि जिस स्त्री पर अभिशाप लगाया गया है वह निहायत भलीमानस है और अभिशाप लगानेवाली स्त्री निहायत दुष्टा और फरेबिन है । नौकर जैसा सुन कर आया था उसका सारा कच्चा चिट्ठा बीरबल से कह सुनाया । सच झूठ की पहचान के लिये बीरबल ने एक तरकीब निकाली । वह पहली भलीमानस स्त्री को बुलाकर पूछा- "यदि तूने सचमुच इस बालक का बध नहीं किया है तो अपना सारा वस्त्र उतार कर एक तरफ अलग खड़ी हो जा ।” वह बोली- "मन्त्रिवर ! मैं चाहे कलकी जगह आजही मार डाली जाऊँ, परन्तु मुझसे यह नहीं होने का । मैं मरने से उतना नहीं डरती जितना निर्लज्जतासे ।” तब बीरबल ने दुश्शीला यानी दुष्टा औरत को बुलाकर पूछा- "यदि तू जानती है कि सचमुच इसने ही तेरे बालक का बध कराया है तो इस सभा के बीच अपना सारा वस्त्र अलग फेंककर एकदम नग्न खड़ी हो जा । वह तुरत वस्त्र उतार कर फेंकने को उद्यत हुई । उसकी ऐसी निर्लज्जता देखकर बीरबल स्वयं शरमिन्दा हुआ और उसे वस्त्र उतारने