अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 292 में से
संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद २० से रोका। उसको निश्चय हो गया कि इसीने बालक का वध किया है। बीरबल ने सिपाहियों को उसे पीटने की आज्ञा दी। उसका दोनों हाथ पाँव बाँध दिया गया और सिपाही मारने को उद्यत हुए। अब तो दुष्टा स्त्री का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरत अपना कसूर स्वीकार कर लिया। बादशाह को उस मक्कारा की काली करतूत पर बड़ा रंज हुआ इसलिये उसे कारागार भुगतने की सजा दी और उस विनम्रा स्त्री को पुरस्कार देकर बिदा किया। गुलाम को मारडाल । सन्ध्या का समय था अकबर अपने बाग में दरबारियों के साथ राजकीय विषयों पर विचार कर रहा था, इतने में तानसेन ने अपनी सारंगी मिलानी शुरू की। सबका ध्यान तानसेन के वाद्य की तरफ आकृष्ट हो गया। दरबार का शेष कार्य स्थगित कर दिया गया। तानसेन ने एक मनहरन तान सारंगी पर छेड़ी। चारोतरफ से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह आनन्दमग्न तकिये के सहारे लेटा हुआ सुन रहा था। चारो तरफ आनन्द छा रहा था। इसी समय शहर का कोतवाल दो आदमियों को लिये हुए आया। उन आदमियों के कपड़े खून से लथपथ हो रहे थे। कोतवाल के अचानक आ पहुँचने से बड़ा रंग में भंग होगया । बादशाह झल्ला गया और झिड़ककर कोतवाल