आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] माड़ोका युद्ध ६५ । ४७
सुमिरिकै अंगद बाली वालो करिया चला समरको जाय ४८ आगे हलका है हाथिन का बलका जिनके नाहिं ठिकान ॥ पहिया दुरकैं उन तोपन के तड़कतिअवैं सिंडरियाबान ४६ पछे रिसाला घोड़न वाला आला चला समरको जाय ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरैं चह चह रहीं धुरी चिल्लाय ५० छाय अँधेरिया गै मारग में बंजर खेत मुहा है जायँ ॥ लक्ष पताका यकमिल हैगे नभ माँ गई लालरी छाय ५१ ऐसी फौजैं मलखाने की वैसी माड़ो का सरदार ॥ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ५२ हौदा हौदा यकमिल हैगे ऊंटन भिड़िगे ऊंट कतार ॥ भाला छूटे असवारन के पैदर चलन लागि तलवार ५३ सूँड़ि लपेटे जंजीरन को हाथी रणमाँ रहे घुमाय ॥ मस्तक गजके गज हनिमारैं अद्भुत समर कहा नाजाय ५४ क्षत्री गर्जे गज हौदन ते जो सुनि गर्भपात है जायँ ॥ कँधालपकनि बिजुलीचमकनि कहूँ कहूँ परै खड्गके घाय ५५ मर मर मर मर ढालैं बोलैं गोली सन्न सन्न सन्नायँ ॥ खट खट खट खट तेगा बोलैं लपलपलपकि लपकि रहि जायँ ५६ झम् झम् झम् झम् झीलम बोलैं नीलम रंग परै दिखराय ॥ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ५७ झल् झल् झल् झल् छुरी झलकैं चम्चम्चमकि चमकि रहि जायँ ॥ बल् बल् बल् बल् क्षत्री बलकैं हब् हब् हबकि हबकिकै खायँ ५८ धर् धर् धर् धर् क्षत्री दौरैं सर् सर् तीर चलावत जायँ ॥ फर् फर् फर् फर् घोड़ा दौड़ैं हिन् हिन् हिन् हिन् हिन्नायँ ५९ टिट् टिट् टिट् टिट् टिटुई हांकैं टिल् टिल् टिल्ल टिल्ल चलि जायँ ॥