आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] ४६ आल्हाखण्ड । ६४
बड़े सजीला जे क्षत्री थे घोड़न उपर भये असवार ३६ धरे नगाड़ा गे ऊंटन पर तोपैं होन लगीं तय्यार ॥ गर्भ गिराविनि कुँवासुखाविनि लछिमिन तोप बड़ी हहकार ३७ ते सब तोपैं रणखेतन को करिया तुरत दीन हँकवाय ॥ बजे नगाड़ा फिरि ऊंटन पर हाहाकारी शब्द सुनाय ३८ औरि बयरिया डोलन लागीं औरै होन लगे व्यवहार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ३६ घोड़ पपीहा पचशब्दागज कोतल कीन गये तय्यार ॥ बैठिंग हाथी करिया वाला तापर होन लाग असवार ४० छींक तड़ाका भै सनमुखमाँ पंडित बोला शकुन विचार ॥ तुम ना जावो रणखेतन को करिया माड़ो के सरदार ४१ राहु वारहें अठयें बेप्फै तुम्हरे दृष्टि शनीचर भाय ॥ घात चन्द्रमा दशयें आयो तुम ना धरो अगाड़ी पाँयँ ४२ सुनिकै बातें ये पण्डित की तुरतै बोला करिंगाराय ॥ शकुन विचारै रयत रेजा जो धरि मौर बियाहन जाय ४३ शकुन विचारैं कछु क्षत्री ना जो रण चढ़िकै लोह चबायँ ॥ कूचके डंका बाजन लागे मारू शब्द रहे हहराय ४४ रंगा बंगा शहाबाद के दोऊ घोड़न चढ़े पठान ॥ रण की मौहरि बाजन लागी घूमनलागे लाल निशान ४५ करिया चलिभो समरभूमि को मनमें श्रीगणेश को ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को औ सूर्यन को माथ नवाय ४६ किह्यो कीर्त्तन कृष्णचन्द्र को जिन अर्जुनकी करी सहाय ॥ दोउ पद बन्द्यो रामचन्द्र के लङ्का फते करी जिन जाय ४७ पूत अंजनी को हनुमत जो ताको बार बार शिरनाय ॥