आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ आल्हखण्ड । १९० अबै न आल्हा कछु बिगरा है नाकछु बहुतभयो नुकसान ७८ पुत्र हमारे मरि चारो गे हमरे बरै करेजे आग ॥ जो भगि जावो अब मोहबे को होवै बड़ी तुम्हारी भाग ७६ उठिकै हौदाते आल्हारण बोले दूनों भुजा उठाय ॥ रहे अधर्मी ना कौनों युग रावण कौरव के समुदाय ८० काह हकीकति त्वरि जम्बा है कोल्हू डारे बाप पिराय ॥ लरिका बिगरे अब ऊदन हैं जियतै कोल्हू डैरैं पिसाय ८१ सँभरिकै बैठै अब हौदापर जम्बा खबरदार है जाय ॥ मारु सिरोही म्वरि छाती माँ कैसी लाये शान धराय ८२ हमरो बाना मरदाना है यह हम ठीक दीन बतलाय ॥ उठै सिरोही जो रण हमरी तौ फिरि कौन परै दिखराय ८३ इतना सुनिकै नृप जम्बा ने कम्मर खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचि तड़ाका फिरि मारा शिर आल्हा लीन ढालपर वार ८४ आल्हा बोल्यो फिरि जम्बा ते दूसरि वार करो सरदार ॥ खैंचि सिरोही ज़म्बा मारी आल्हा लीन ढालपर वार ८५ कबों सिरोही जब बांधी ना मुर्चा खायगई तब धार ॥ वार तीसरी अब तुम मारो राजा माड़ो के सरदार ८६ साँकरि दीन्ही पचशबदाको आल्हा बोले वचन सुनाय ॥ हौदा गिरावै तुम जम्बा का हमरे निमक अदा है जाय ८७ खैंचि सिरोही दोउ हाथन सों जम्बा कीन तीसरी वार ॥ ढाल फटिगै गेंडावाली बचिगा आल्हा परमझुझार ८८ साँकरि फेरी पचशब्दाने हौदा तुरतै दीन गिराय ॥ आल्हा कूदे फिरि हौदा ते पकरयो नृपै तुरतही आय ८६ मलखे देवा सय्यद ऊदन चारो गये तहांपर आय ॥