भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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माड़ोका युद्ध । १०६ ५१ कोउकोउ ढालनको बचुकाकरि पीठिम डारिलीन भयखाय ६८ हम सौदागर हैं जयपुरके आये राजमहल में भाय ॥ पहिले फाटक के ऊपरमाँ मुर्चा परा बरोबरि आय ६६ जिन्हें पियारी रहें घर तिरिया तिन रण डारिदीन तलवारि ॥ हमें न मारो हमें न मारो दादा बापूकैरें गुहारि ७० त्यही समैया त्यहि अवसरमाँ बोला तहाँ बीरमलखान ॥ राजा जम्बाके मुर्चा पर ठहरे नहीं एकहू ज्वान ७१ सुनिकै बातें ये मलखे की आल्हा हाथी दीन बढ़ाय ॥ जम्बा केरे तहँ मुर्चामॉ पहुँचे तुरत बनाफरराय ७२ हाथी जानै भल आल्हा को यहु है देशराज को लाल ॥ देशराज औ बच्छराज दोउ मेरो भलो कीन प्रतिपाल ७३ ज्ञान जानवर में जैसो है मानुष नहीं दशो में पांच ॥ गर्भवती नारी के ऊपर फिरिनहिंचढ़ै जानवरसाँच ७४ ( रागानुरागोपदेशोपकारक सवैया ॥ ) साँच रह्यो मन ज्ञान विरागमें याँच रह्यो कर्त्ता कर्त्तारे ॥ आनि बिपत्तिपरी शिरऊपर राख हरी भर्त्ता भर्त्तारे ॥ जीव गुहारपुकार करी जब आय हरी कर्त्ता कर्त्तारे ॥ साँच न याँच करै ललिते तब नाहिं हरी भर्त्ता भर्त्तारे ७५ तैसो हाथी तहँ आल्हा को साँचो जाति पाँतिमें साँच ॥ मूंड़ि लपेटे जंजीरन को मारै हेरि हेरि दश पाँच ७६ बिकट लड़ाई हाथी कीन्ह्यो करणी रही समर में नाच ॥ जम्बा बोला तब आल्हा ते मानो बचन हमारे साँच ७७ तुम फिरिजावो म्वरे मुहराते हमरे बचन करो परमान ॥