भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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६० आल्हखण्ड । १०८ चहला उठिरहि तहँ चरबिनकी औ वहिचली रक्तकी धार ५६ शूर सिपाही माड़ोवाले नंगी हाथ लिये तलवार ॥ चलै सिरोही तहँ सँभरा भरि ऊना चलै विलाइतिक्यार ५७ दूनों फौजैं यकामिल हैगइँ वीरन रहे वीर ललकार ॥ दुइ दुइ तुरैन के बँधवैया ई सब डारि भागि तलवार ५८ जितने कायर रहें फौजन में तर लोथिन के रहे लुकाय ॥ हेला आवै जब हाथिन का तब बिनमरे मौत है जाय ५६ देवा बोलै तब ऊदनते हमरे सुनो बनाफरराय ॥ भागे क्षत्रिन को मार्यो ना नहिं सब क्षत्री धर्मनशाय ६० फूल केतकी का सूंघ्यो ना जबलग फुलवामिलै गुलाब ॥ दाया राख्यो द्विज देवन में ऊदन यही धर्म की आव ६१ घोड़ी कबुतरी का चढ़वैया मलघे बड़ा लड़ैया ज्वान ॥ बहुतन मारै तलवारी सों बहुतन लेय ढालसों प्रान ६२ को गति बरणै तहँ सय्यद की नाहर सिरगापर असवार ॥ गुर्ज उठाये रणमाँ मटकै पटकै बड़े बड़े सरदार ६३ अली अली कहि सय्यद धावै रणमाँ गली गली है जाय ॥ भली भली कहि आल्हा बोले रणमाँ थली थली थर्राय ६४ चली चली तहँ धरती डोलै बोलैं हली हली सब गाय ॥ कली कली जस सारँग सम्पुट तैसे डली डली मिलिजायँ ६५ को गति बरणै समरभूमि कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ राजा जम्बा के मोर्चा पर कोउ रजपूत न रोकै पायँ ६६ चीरिकै धोती मारि लँगोटो कोउ कोउ अंग बिभूतिरमाय ॥ लोहुभरी माटी फिरि लैके रामानन्दी तिलक लगाय ६७ हमैं न मारो ओ रजपूतो हमतो जगन्नाथ को जायँ ॥