आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ११५ ६७ दान दक्षिणा बाँटन लागी तुरतै महलनबिप्रबुलाय १३८ जितनी माया रहै माड़ो की सो सब ऊदन तुरत मँगाय ॥ जहाँ खजाना परिमालिक को तामें दीन सबै भरवाय १३६ बड़ी खुशहाली भै मोहबेमाँ घर घर होयँ मङ्गलाचार ॥ उजरिगो माड़ो त्यहिसमयामाँ जहँ तहँ घूमें श्वानासियार १४० मैं पदबन्दौं पितु अपने के फिरि फिरि बारबार शिरनाय ॥ करी सहायि यहि समया में ताते गयौं कथा सबगाय १४१ आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो होतो ना ललितेकहतकथाकसगाय १४२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द्र औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर १४३ माथ नवावौं रामचन्द्र को करिकै कृष्णचन्द्र को ध्यान ॥ दोउपद् बन्दों शिवशंकर के गणपतिगणाधीशबलवान १४४ दोउपद् ध्यावौं महरानी के जिनअभिमानी डरे नशाय ॥ पूरी तरंग यहाँ सों द्वैगै तव पद् सुमिरिदुर्गामाय १४५ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसार उत्तरामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसादकृतआल्हाविजयवर्णननामपञ्चमस्तरङ्गः ५॥ माड़ोका युद्ध समाप्त ॥ इति ॥