आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका बियाह । ११६ ३ तार अपारन के बिरवा बहु कहूँ कहूँ खड़े वृक्ष कहार ११ टेसू फूले कहूँ सोहत हैं जैसे सोहैं लड़ैता ज्वान ॥ रूप गुलाबन को देखत खन फूलनछांड़िदीनअभिमान १२ कौन कनै रन को वर्णन कर चाँदनि चाँद सरिस गै छाय ॥ फूल दुपहरी के भल सोहैं मोहैं मुनिन मनै अधिकाय १३ गेंदन केरे बहु बिरवा हैं अर्जुन वृक्ष परै दिखराय ॥ मेला लाग्यो नौरङ्गिन का हेला निंबुन का दर्शाय १४ ठेला भरि भरि अमरुतन का माली राजभवन को जाय ॥ केवँड़ा केरी उठै सुगन्धी कहुँकहुँ नागबेलिगै छाय १५ ताही बगिया सुनवाँ खेलै मेलै गले सखिन के हाथ ॥ सखियाँ बोलीं तहँ सुनवाँते तुम नित खेलोहमारेसाथ १६ पैर महावर पै तुम्हरे ना -टिकुली नहीं बिराजै भाल ॥ द्रव्य तुम्हारे का घर नाहीं जो नहिं ब्याहकरें नरपाल १७ इतना कहिकै सब आलिनने औ करताली दीन बजाय ॥ समय दुपहरी को जान्यो जब तब फिरि खेलबन्द द्वैजाय १८ कीरति गावैं सब आल्हा की माड़ो लिहेनि बापका दायँ ॥ धन्य बनाफर उदयसिंह हैं आल्हा केर लहुरवा भाय १६ ऐसी बातें सखियाँ करतै अपने भवन पहूँचीं आय ॥ ताही क्षणमें सुनवाँ मन में अपने ठीक लीन ठहराय २० ब्याही जैबे आल्हा सँग में की मरिजाब जहरको खाय ॥ छाय उदासी गै चिहरा में पूँछै बार बार तब माय २१ कौन रोगहै त्वरि देहीमाँ बेटी हाल देउ बतलाय ॥ पीली ह्वैगै सब देही है औतनकाँपिकाँपि रहिजाय २२ को हितकारी है मातासम नाता बड़ा जगत केहिभाय ॥