आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका बिबाह । १२१ ५ लिखी हकीकत सब आल्हाको सुनवाँ बारबार समुझाय ३५ नामी ठाकुर तुम मोहबे में हमरो ब्याह करो अब आय ॥ नहिं मरिजयो जहर खायकै दूनों भाइ बनाफरराय ३६ लिखिकै पाती गल सुवनाके सुनवाँ तुरत दीन लटकाय ॥ मूठी दीन्ह्यो फिरि कोठे ते सुवना चला मोहोबे जाय ३७ चन्दन बगिया सुवना पहुँँच्यो तहँ पर रहें उदयसिंहराय ॥ चन्दन ऊपर सुवना बैठो परिगा दृष्टि तुरतही आय ३८ भल चुचकारयो उदयसिंहने आपन नाम दीन बतलाय ॥ सुवना बैठ्यो तब हाथेपर पाती छोरि लीन हर्षाय ३६ बाँचिकै पाती तब ऊदन ने औ सय्यद को दीन सुनाय ॥ सय्यद आल्हासों बतलायो मलखे देबै दीन बताय ४० लैके पाती औ सुवना को गे परिमाल कचहरी धाय ॥ कही हकीकति सब राजा सों पाती दीन उदयसिंहराय ४१ पढ़िकै पाती को परिमालिक मनमाँ गये सनाकाखाय ॥ होश उड़ान्यौ परिमालिक का मुहँकाबिरगयो कुम्हिलाय ४२ बोलि न आवा परिमालिक सों औ द्वाढ़ालों लार सुखाय ॥ थर थर थर थर देही काँपी शिरसों मुकुट गिरा भहराय ४३ रोम रोम सब ठाढ़े व्हैगे नैनन बही आँसु की धार ॥ धीरजधरिकै परिमालिक फिरि औ मलखे तन रहे निहारि ४४ मलखे बोले तब राजा ते साँचे बचन सुनो नरपाल ॥ टीका पठयो है बेटी ने सोनहिंलौटिसकैक्यहुकाल ४५ सुनिकै बातें मलखाने की बोले तुरत रजापरिमाल ॥ ब्याधि नशायो गढ़माड़ो की दूसरि ब्याधिभयोफिरिहाल ४६ टीका फेरो नयनागढ़ को मलखे मानो कही हमार ॥