आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका विवाह । १२५ ६ जावो जल्दी तुम धूरेपर हमको खबरि सुनावो आय ॥ सुनिकै बातें तीनों चलिभे धूरे तुरत पहुंचे जाय ८२ ऊंचे टिकुरी तीनों चढ़िकै दूरिते लखैं तमाशा भाय ॥ देखिकै फौजें मलखाने की तीनों गये तहाँ सन्नाय ८३ तीनों लौटे त्यहि टिकुरीते अपने महल पहुंचे आय ॥ भोजन केरी फिरि बिरियामाँ राजै खबरि दीन बतलाय ८४ लगी कचहरी हाँ आल्हाकी भारी लाग तहाँ दरबार ॥ बैठक बैठे सब क्षत्री हैं एकते एक शूर सरदार ८५ मीराताल्हन बनरसवाले आली खानदान के ज्वान ॥ बड़े पियारे ते क्षत्रिनके अपने धर्म कर्म अनुमान ८६ सच्चे साथी रहें चारों के यारों मानों कही हमार ॥ ऐसे होते जो सय्यद ना कैसे बने रहत सरदार ८७ अली अलामत औ दरियाखाँ बेटा जानबेग सुल्तान ॥ औरो लड़का रहें सय्यदके एकते एक रूप गुणखान ८८ मन्नागूजर मोहबे वाला बैठा बड़ा सजीला ज्वान ॥ रुपनाबारी ते त्यहि समया बोले तहाँ बीर मलखान ८९ ऐपनावारी बारी लै कै राजैद्वार पहुंचो जाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की रुपना बोला शीशनवाय ६० औरो नेगी मोहबे वाले आये साथ बनाफरराय ॥ ऐपनावारी बारी लै कै द्वारे मूड़ कटावै जाय ६१ सुनिकै बातें ये रुपना की बोले तुरत उदयसिंहराय ॥ तुमको नेगी हम मानैं ना जानें सदा आपनो भाय ६२ दादा बियाहन को रहि हैं ना बतियाँ कहिबे को रहिजायँ ॥ यश नहिंजावै नर मरिजावै परहित देवै मूड़क़टाय ६३