आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका विवाह । १२७ ११ कैसो बारी यहु आयो है नाहर घोड़ेका असवार ॥ जालिम राजा नैपाली है तासों कीन चहै तलवार १०६ यहै सोचिकै द्वारपालने औ रूपन ते कहा सुनाय ॥ गरमी तुम्हरी जो उतरी हो बोलो ठीक ठीक तुम भाय १०७ सुनिकै बातें दरवानी की रूपन गरु दीन ललकार ॥ नगर महोबा जगमें जाहिर नामी मोहबे के सरदार १०८ तिनको नेगी मैं द्वारेपर लीन्हे खड़ा ढाल तलवार ॥ जौन शूरमा हो नैनागढ़ आवै देय नेग सो द्वार १०९ इतनी सुनिकै दरवानी ने राजै खबरि सुनाई जाय ॥ ऐपनवारी बारी लावा भारी बात कहै सो गाय ११० चारिघरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्तकी धार ॥ जौन शूरमाहो राजाघर आवै देय नेग सो द्वार १११ इतना सुनतै महाराजाके नैना अग्नि बरण द्वैजायँ ॥ पूरण राजा पटनावाला बोला राजै बचन सुनाय ११२ हम चलिजावैं अब द्वारेपर बारी नेग देयँ चुकवाय ॥ इतना कहिकै चलि ठाढ़ो भो साथै औरो चले रिसाय ११३ सवैया ॥ द्वार चले तलवार लिये रट मारहि मार कुमारन पेखा । लाल गुपाल गहे करबाल खेलैं जसफाग भयउ तस भेखा ॥ मार अपार जुझार किये औ गिरे रणखेत रहे नहिं शेखा । बारीकरै कब रारी नृपै ललिते मलखान कि है यह लेखा ११४ पूरन राजा पटना वाला लीन्हे नांगि हाथ तलवार ॥ सो धरि धमका त्यहि रूपनके रूपन लीन ढालपर वार ११५