भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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९२ आल्हाखण्ड । १२८ सांगि उठाई फिरि रूपन ने राजै बार बार ललकार ॥ लटुवा लाग्यो पूरन शिर में औ बहिचली रक्तकी धार ११६ अगल बगल के फिरि मारतभा दाँयें बाँयें दीन हटाय ॥ ऐंड़ा मसके फिरि घोड़ा के फाटक तुरत पार है जाय ११७ गली गली में फिरि मारत भो औ वहिचली रक्तकी धार ॥ घरी चारके फिरि अरसा में लश्कर आयगयो असवार ११८ लाले रंग सों भीजे दीख्यो फागुन टेसू के अनुहार ॥ पूँछी हकीकति तब मलखेने नाहर मोहबे के सरदार ११९ कैसी गुजरी नैनागढ़ में रूपन हाल देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें मलखाने की रूपन यथातथ्य गा गाय १२० हल्ला हैगा नैनागढ़माँ जहँतहँ कहन लागि सब कोय ॥ ऐस बहादुर जहँके परजा तहँकेनृपतिकहौ कसहोयँ १२१ देखि तमाशा यहु बारी का राजा बार बार पछिताय ॥ बड़ी हीनता हमरी हैगै बारी जियत निकरिगा हाय १२२ जोगा भोगा दोऊ लरिका बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ हुकुम जो पावैं महराजा का सबकी कटा देयँ करवाय १२३ जितनी रौढ़ें चढ़ि आई हैं सो विनघाव एक ना जायँ ॥ खेदिकै मारैं हम मोहबे लग टेंटुवा टायर लैँ छिनाय १२४ सुनिकै बातें ये लरिकन की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तुरत नगड़ची को बुलवायो तासों बोल्यो हुकुम सुनाय १२५ बजै नगाड़ा नैनागढ़ में सबियाँ फौज होय तय्यार ॥ भोर सुरेरे पहफाटत खन मारों मुहवेके सरदार १२६ इतना कहिकै दूनों चलिभे अपने महल पहुँचे जाय ॥ रैन खटिगा दिननायक सों झण्डागड़ानिशाको आय १२७