आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका विवाह । १२६ ९३ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ परे आलसी निजनिज खटिया घों घों कंठ रहे घराँय १२८ माथ नवावों पितु अपने को जो नित मेरी करैं सहाय ॥ करों तरंग यहाँ सों पूरण पूरण ब्रह्म रामको ध्याय १२६ आगे फौजें दूनों सजिहैं मचि हैं घोर शोर घमसान ॥ जोगा भोगा के मुर्चापर लड़ि हैं खूब बीरमलखान १३० इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागना- रायणजीकी आज्ञानुसारउन्नावप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतबरातआगमनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ कवित्त ॥ अंजली दिहेते रोग देहसों हटाय देत ध्यान के धरेते दुख दारिद दिखातना । ज्ञानसों विचारे मान राजैसों कराय देत नामके उचारे मुक्ति पदवी बिलातना ॥ धारे उर व्रत काम क्रोधहू नशाय देत दीनहैं पुकार करे खीन कुम्हिलातना । बोरिदेत विघ्नन मिरोरि देत शत्रुमुख ललित करजोरे पाप रंचहू लखातना १ सुमिरन ॥ मारतण्ड मैं तुमको सुमिरों धरिकै चरणकमल में माथ ॥ सूर्य्य भास्कर सविता रवि औ औरो नाम बहुत दिननाथ १ कथा पुराणन में पढ़िकै मैं जानों काश्यपेय महराज ॥ जो कोउ आयो तव शरणागत गई न तासु कबों जगलाज २ तुम्हरे कुलमाँ रघुनन्दन भे बन्दनकरैं ललित तिनक्यार ॥ अक्षत चन्दन औ फूलन सों मानस पूजन सदा हमार ३ तुम्ही सहाई हौ दीनन के गाई सबै पुराणन गाथ ॥ स्वई भरोसा धरि जियरेमाँ जावाचहौं नांघि भवपाथ ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ जोगा भोगा दोऊ लड़िहैं लड़िहैं उदयसिंह सरदार ५