आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हखण्ड । १३० अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरबमाँ किरणन कीन जगत उजियार ॥ डंका बाज्यो नैनागढ़माँ सबियाँ फौज भई तय्यार १ बसैं बघेले औ चन्देले पाँवर सूरबंश सरदार ॥ माड़वाड़ के क्षत्री साजे औ परिहार गुटैयाचार २ हाड़ा वाले बूंदी वाले औ राठौर लीन सजाय ॥ तुरत निकुम्भन को सजवायो औ गौरन को लीन बुलाय ३ सजि गुहलौता औ कछवाये बहुतक चन्द्रबंश के ज्वान ॥ तोमर ठाकुर तुमरवार के सजिगे मैनपुरी चवहान ४ सजे भदावर वाले क्षत्री सजिगे गहिलवार सरदार ॥ बैस डौंडियाखेरे वाले जिनके बांट परी तलवार ५ हबशी साजे औ दुर्रानी जे मनइन के करें अहार ॥ कुरी छतीसों सब सजवाई ठाकुर सबै भये तय्यार ६ पूरन राजा पटनावाला सोऊ लीन ढाल तलवार ॥ जोगा भोगा दोनों ठाकुर अपने घोड़न भे असवार ७ रणकी मौहरि बाजन लागी रणकौ होनलाग व्यवहार ॥ दाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ८ मारु मारुकै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल को गति वरणै तहँ क्षत्रिनकै एक ते एक दई के लाल ६ हतु हुंकारनि तोपैं सजि गईँ जिनसों होय घोर घमसान ॥ मारू डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान १० खर खर खर खरकै रथ दौरे ख्बा चले पवन की चाल ॥ खट पट खट पट तेगा बोलैं मर मर होयँ गैंड़की ढाल ११ धक धक धक धक करै महावत हाथी धकापेल चलिजायें ॥