आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] आल्हाका विवाह । १३१ १५
कोउ कोउ घोड़ा मोर चालपर कोउ कोउ सरपट रहे भगाय १२ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउ कोउ चले कदमपर जायँ ॥ कोउ कोउ घोड़ा ऐसे जावैं जिनके टाप न परै सुनाय १३ कोउ कोउ घोड़ा कावा देवैं कोउ कोउ गर्जि रहे असवार ॥ कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि चमचम चमाचम्म तलवार १४ घन घन घन घन घंटा बाजैं घूमत चलैं मत्त गजराज ॥ बल बल बल बल करैं साँड़िया भागत चलैं समर के काज १५ हिनहिन हिन हिन घोड़ा हींसैं खीसैं कायर देखि परान ॥ छाय अँधरिया गै पृथ्विी में गर्दा छाय गई असमान १६ देवता सकुचे आसमान में जंगल जीव गये थर्राय ॥ घरी चार के फिरि अर्सा में सेना अटी समर में आय १७ धूली दीख्यो आसमान में मलखे बोल्यो बचन सुनाय ॥ सजो बेन्दुला के चढ़वैया फौजै गई ऊपर अब आय १८ सुनिकै बातें मलखाने की ऊदन गरु दीन ललकार ॥ सजो सिपाही मोहबे वाले सबियाँ फौज होय तैयार १६ झीलम बख्तर पहिरिसिपाहिन हाथ म लीन ढाल तलवार ॥ सिरगा घोड़े की पीठिमाँ सय्यद तुरत भये असवार २० चढ़ो कबूतरी में मलखाने अपनी लिये ढाल तलवार ॥ घोड़ मनोहर की पीठी माँ देवा चढ़त न लागी बार २१ बड़ी बड़ी तोपैं अष्टधातु की सो चरखिन में दीन चढ़ाय ॥ लै लै थैली बारूदन की सो तोपन में दई चलाय २२ बत्ती दइ दइ फिरि तोपन में रंजक तुरत दीन धरवाय ॥ बम्बके गोला छूटन लागे परलय जनो गई नगच्याय २३ गोली ओला सम वर्षत भई भनभन भन्नभन्न भन्नाय ॥