आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ आल्हखण्ड । १३२ सर सर सर सर कै शर छूटैं मन मन मन्त्र मन्त्र मन्त्राय २४ खट खट खट खट तेगा बोलैं हट हट करैं लड़ैता ज्वान ॥ बड़ी लड़ाई भै नैनागढ़ जोगा भोगा के मैदान २५ सूंदि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतनकेर ॥ हौदा हौदा यकमिल हैगे मारैं एक एकको हेर २६ सात लाख दल मलखे लीन्हे भोगा पांच लाख परमान ॥ मीराताल्हन औ जोगाका परिगा समर बरोबरि आन २७ भोगा बोला तब ऊदनते ओ परदेशी बात बनाय ॥ कहाँते आयो औ का करिहौ आपन हाल देव बतलाय २८ ऊदन बोले तब भोगाते तुमते सत्य देयँ बतलाय ॥ देश हमारो नगर मोहोबा जहाँपर बसै चंदेलाराय २६ छोटे भैया हम आल्हाके औ ऊदनहै नाम हमार ॥ सुनवाँ व्याहन आल्हा आये मानौ सत्य वचन सरदार ३० बाँधिकै मुशकें त्वरे बप्पाकी भँवरी फिरी बड़कवा भाय ॥ नीके ब्याहौ घर फिरिजावो अपने बाप देउ समुझाय ३१ सुनिकै बानै ये ऊदन की भोगा कालरूप हैजाय ॥ धोखे माड़ो के भूल्यो ना जहँ लै लियो बापका दायँ ३२ जाति बनाफर की ओछी है औ सब क्षत्रिन केर उतार ॥ कठिन बिसाने जग में जाहिर मोहबे लौटि जाउ सरदार ३३ बातै सुनिकै ये भोगा की बोला बिहँसि लहुरवा भाय ॥ नदिया भागै तौ गंगाजायँ गंगा भागि समुन्दर जायँ ३४ महादेव अर्घाते भागैं धरती लौटि रसातल जाय ॥ ऊदन भागैं समरभूमिते तौ फिरिभागिकहाँकोजायँ ३५ इतना कहिकै बघऊदनने सुमिरि हृदय शारदा माय ॥