भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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[Header] आल्हाका बिवाह । १३३ १७

देवी शारदा महहरवाली मानों गई भुजापर आय ३६ बाहू फरके बघऊदन के फौजन घुसा बनाफरराय ॥ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ३७ तैसे क्षत्री ऊदन देखैं भागैं तुरतै पीठि दिखाय ॥ बड़ी लड़ाई मलखे कीन्हों अद्भुतसमर कहा ना जाय ३८ घोड़ मनोहर की पीठीपर देबा गरु करै ललकार ॥ हनि हनि मारै रजपूतन को बहुतक जूझिगये सरदार ३९ अली अलामत औ दरियाखाँ बेटा जानबेग सुल्तान ॥ ये सब लड़का सय्यदवाले तहँपर करैं घोर घमसान ४० मन्ना गूजर मोहबेवाला दोऊ हाथ करै तलवार ॥ जोगा भोगा पूरन राजा येऊ करैं तहां पर मार ४१ जूझे सिपाही नैनागढ़ के लगभग एक लाखके ज्वान ॥ पांच सहस मोहबे के जूझे करिकै समर भूमि मैदान ४२ जोगा बोला तब भोगा ते मानो कही हमारी बात ॥ खबरि सुनावो महाराजाको जैसी देखि परै कुशलात ४३ सुनिकै बातें भोगा चलिभा नैनागढ़ै पहूंचा जाय ॥ हाथ जोरिकै महाराजा के भोगा यथातथ्य गा गाय ४४ सुनिकै बातें महाराजा ने लायो अमरढोल को जाय ॥ सो दै दीन्ह्यो कर भोगा के भोगाचलिभाशीशनवाय ४५ आयकै पहुंच्यो समर भूमि में भोगा दीन्ह्यो ढोल बजाय ॥ मुर्दा उठिकै जिन्दा हैंगे घैहा उठे तुरत हरषाय ४६ उठे सिपाही नैनागढ़ के मारैं खैंचि खैंचि तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ४७ ढारे मुर्दा हैं लोहुन में मानों कच्छ मच्छ उतरायँ ॥