भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

१८८ आल्हखण्ड । १३४ पगड़ी गिरि गईँ त्यहि लोहू में फूले कमल सरिस दर्शायँ ४८ परीं बंदूकें कहुँ लोहू में काली नागिनिसी मन्नायँ ॥ पांच कोसलों चली सिरोही लोथिन उपरलोथि दिखरायँ ४६ बड़ी लड़ाई मै नैनागढ़ मारा मारा परै सुनाय ॥ कोऊ हारा नहिं काहू सों दोउरण परा बरोबरि आय ५० जोगा ठाकुर नैनागढ़ का सय्यद बनरस का सरदार ॥ भोगा देवाके मुर्चा माँ दोउ दिशिहोय बरोबरि मार ५१ 'मन्नागूजर पूरन राजा दोऊ करें खूब तलवार ॥ बड़े लड़ैया रणमाँ राहिगे कायर छांड़ि भागि हथियार ५२ अमरढोल कहुँ रणमाँ बाजै गिरि उठि लड़ैं लड़ैताज्वान ॥ देखि तमाशा ऊदन बोले दादा सुनो बीर मलखान ५३ मरिमरि जीवैं नैनागढ़ के मैना दीख कबों असभाय ॥ कावा दै कै ऊदन चलिभे नैनागढ़ै पहुंचे आय ५४ संध्या द्वैगै ह्वाँ लश्कर में तब फिरि मारु बंद द्वैजाय ॥ ऊदन पहुंचे ह्वाँ मालिन घर तुरतै मोहर दीन थँभाय ५५ खबरि सुनावो म्वारि भौजीका आयो मिलन उदयसिंहराय ॥ सुनिकै वातैं मालिनि चलिभै सुनवैं खबरि सुनाई जाय ५६ सुनवाँ चलिभै तब महलन ते आई जहाँ लहुरवा भाय ॥ पाग बैंजनी शिरपर बाँधे ऊदन कह्यो बचन मुसुकाय ५७ याही कारण चिठिया पठई जल्दी अवो लहुरवा भाय ॥ जियत मोहोबे कोउ जाई ना डरिहौ बंश नाश करवाय ५८ मरे सिपाही क्यों जीवत हैं भौजी हाल देउ बतलाय ॥ सुनिकै वातें सुनवाँ बोली तुम सुनिलेउ लहुरवा भाय ५६ बरा बर्षलों मेरे वापने कीन्ह्यो कठिन तपस्या जाय ॥