आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाका विवाह । १३५ १६ मांगु मांगु तब इन्दर बोले बप्पा बोले माथ नवाय ६० अमरढोल जो हमको देवो तौ सब काम सिद्ध हैजाएँ ॥ एवमस्तु तब इन्दर बोले बप्पा भवन पहुंचे आय ६१ जबहीं क्षत्री गिरैं खेतमें अम्मरढोल देयं बजवाय ॥ कान भनक क्षत्रिन के परतै जीवैं तुरत बनाफरराय ६२ धोखे माड़ोके रहियो ना जहँ लैलियो बापका दायँ ॥ लड़े न जितिहौ मेरे बापसों तुमको भेद देउँ बतलाय ६३ देवी पूजन कल मैं जैहौं लेहौं अमरढोल मँगवाय ॥ माली बनिकै तहँ तुम आयो लीन्ह्यो अम्मर ढोल चुराय ६४ इतना कहिकै सुनवाँ चलिभै अपने महल पहुंची आय ॥ ऊदन आये फिरि तम्बूको बैठे जहाँ बनाफरराय ६५ हाल बतायो मलखाने ते सोयो सबै शतिको पाय ॥ भोर भुरहरे मुर्गा बोलत माली बने उदयसिंहराय ६६ जायकै पहुंचे तेहि मठियामाँ जहँपर सुनवाँ गई बताय ॥ घोड़ बेंदुला तहँ बांधा है मालिन बीच बनाफरराय ६७ फूल डिलैया माँ सोहैं भल सुन्दर हरवा रहे बनाय ॥ सुनवाँ जागी ह्याँ महलन में बोली मातै बचन सुनाय ६८ राति सुपनवाँ यक मैं देखा माता तुम्हें देउँ बतलाय ॥ संग सहेलिन देवी पूजैं तहँपर अमरढोल अरराय ६९ त्यहिते मनमाँ यह आई है पूजन करों भवानी जाय ॥ तुमसों माता यह बिनवतिहौं देवो अमरढोल मँगवाय ७० सुनिकै बातें रानी चलिभै पहुंची तुरत सेजपर जाय ॥ हाल बतायो महराजा को लीन्ह्यो अमरढोल मँगवाय ७१ सो दै दीन्ह्यो लै बेटी को बेटी सखियन लीन बुलाय ॥